Sunday, December 28, 2008

रूम नंबर 17बी


आशीष कुमार अंशु की ये कविता शायद मन को छू जाती हैं।

रूम नंबर 17बी,
अर्जुन प्रसाद सिंह
सन ऑफ पांडू प्रसाद सिंह
तुमसे मिलने कोई मीनाक्षी आई है।

हा..हा..हा..हा..हा..
एक पागल के साथ ऐसी दिल्‍लगी,
ईश्‍वर तुम्‍हें कभी माफ नहीं करेगा।

दिल्‍लगी नही सच
मीनाक्षी आई थी

एक पागल से मिलने
आई हो मीनाक्षी,
आओ,आओ,अंदर आओ।

......मीनाक्षी यहां पागल नहीं रहते
ये वे लोग हैं जो समाज के पैंतरों से वाकिफ नहीं थे,
सच को सच झूठ को झूठ बताते रहे
मन में मैल,चेहरे पर मुस्‍कान इनके नहीं थीं
तुम्‍हारी तरह
मीनाक्षी यहां ठहरे लोग पागल नहीं हैं,
मेरी तरह
पागल है,इस पागलखाने के बाहर की दुनिया।

यहां हम घंटों-घंटों बतिया सकते हैं
एक दूसरे का दुख-दर्द बांट सकते हैं
गहबहियां डालकर
घंटों रो सकते हैं,हंस सकते हैं
यहां कोई पाबंदी नहीं
यहां कोई यह कहने नहीं आएगा
कि तुम पागलों की तरह क्‍यों हंस रही हो...

यहां हर उस बात की इजाजत है जो सभ्‍य समाज नहीं देता
रात को दो बजे तुम चीख-चीख कर अपना दुख रो सकती हो
किसी की मइयत पर हंस सकती हो
दुश्‍मन को दुश्‍मन व दोस्‍त को दोस्‍त कह सकती हो
यहां चेहरे पर छदम मुस्‍कान और
कलेजे पर पत्‍थर रखने की जरूरत नहीं
जैसा तुम करती रही हो
यहां दिखावा नहीं चलता,यहां सच्‍चाई चलती है

आज तुम्‍हारी आंखों में मेरे लिए
स्‍नेह नहीं था
दया,तरस,सहानुभूति के मिश्रित भाव नहीं थे,
सभ्‍य समाज की एक विदुषी,
एक पागल के लिए
अपने मन में इसी तरह के भाव रख सकती है।

जा रही हो मीनाक्षी
जाओ........
उस समाज में खुश रहो जिसे हम
पागलखाना समझते हैं ...

- आशीष कुमार अंशु

2 comments:

कुश said...

वाह आशीष जी को बधाई

Amit said...

bahut khub likha hai...bhadhaai

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