Saturday, January 31, 2009

तालाब (मीडिया) को खंगालना जरूरी

एक अहम सवाल पत्रकारों की सबसे बड़ी बीमारी क्या है? ऐसी कौन सी चीज है, जिसके महारथी यहां भरे पड़े हैं।

दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की जरूरत नहीं है। इसका शॉटॆ नेम है-लेग पुलिंग। यानी टांग खींचने की आदत। पत्रकार बिरादरी इन दिनों एक-दूसरे की टांग खींचने में मशगूल है। सिलसिला जारी है-हम अच्छे हैं, तुम बुरे हो। हम सफेद हैं, तुम काले हो। विरोधी तमगा के पास भी कलम और आजादी है,पलट कर वे भी वार करते हैं। दुनिया है कि मजे लेती है। तालाब में आये इस करंट का बहाव किधर है,कोई नहीं जानता है। भंवर में पैर फंसा और आप गये।

पत्रकार बिरादरी आज लेगपुलिंग में लगी है, लेकिन एक साथॆक बहस के साथ। बहस है कि हमारे द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा मैटर या सामग्री सही है या नहीं। हमारे हिसाब से ये बहस या हलचल जरूरी है। सफाई के लिए तालाब को खंगालना जरूरी है। जरूरी है कि बहस को आगे बढ़ाया जाये। आत्मालोचना के साहस को बढ़कर स्वीकारना होगा। जो नहीं स्वीकारते हैं, वे कमजोर हो जाते हैं। आप तटस्थ की भूमिका अपना कर भी चौथे स्तंभ के साथ न्याय नहीं करेंगे। बहस जरूरी है, क्योंकि जो तटस्थ हैं, उनसे भी पूछेगा इतिहास। बहस को जारी रहने दीजिये। एक खास न्यूज चैनल ने अगर दूसरे न्यूज चैनलों द्वारा पेश किये जा रहे न्यूज पर सवाल उठाया, तो वे बधाई के पात्र हैं। इस नयी बहस की शुरुआत होनी चाहिए थी और अब जब हुई है, तो इसका खुले दिल से स्वागत कीजिये। अब तक सिफॆ फुसफुसाहट थी कि ऐसा हो रहा है। लेकिन अब तो यह जीवंत दस्तावेज की तरह हमारे सामने है कि ऐसा किया जा रहा है। मेरी ओर से उस खास न्यूज चैनल की खास पहल का स्वागत है।

2 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

ओह हो
तभी मैं सोचूं
कि किसी की एक टांग लंबी
किसी पत्रकार की दूसरी टांग लंबी
और किसी किसी की तो टंग लंबी
टंग तो खैर चैनलों की भी लांबी है
जैसे लांबी में रहने वाला सांप
होता है लांबा और रहता है लांबी में
वैसे ही चैनल अपनी लांबी टंग से
फुफकारते रहते हैं 24 घंटे बिना रुके
न वे रुकते हैं, न रोकना चाहते हैं
सिर्फ कामर्शियल ब्रेक के सिवाय
क्‍योंकि कमाना ही जिंदगी है
बिना कमाये चैनल कोई क्‍यों चलाये
अब यह टिप्‍पणी भी हो रही है लंबी
होती ही जाएगी यदि शब्‍दों को पकड़
धकड़ करके आगे बढ़ता जाऊंगा
तो वैसे तो अंकुश टिप्‍पणियों पर
लगता कहीं नहीं है पर ज्‍यादा
लंबी हो जाएगी टिप्‍पणी तो
संभावना वो भी दूर नहीं है।

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

केंकणत्व तो राष्ट्रीय चरित्र है। :)

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