Tuesday, April 14, 2009

खुलापन, पश्चिमी देश और हमारा घटिया नजरिया


photo from google


एक ब्लाग पर गया, मजेदार सवाल, पश्चिम देशों में खुलापन है, लेकिन जनसंख्या हमारे यहां ज्यादा क्यों है?

एक सवाल बिना किसी झिझक के पूछा जाना, अच्छा लगा।

अब एक सवाल, हमारे यहां परिवार की अवधारण इतनी मजबूत है, पश्चिम में क्यों नहीं है? सारे सवालों का जवाब बस ये ही एक जवाब है। खुलापन का मतलब सिर्फ शारीरिक संबंध बनाना या स्वच्छंदता नहीं होता। खुलापन का मतलब होता है, विचारों में खुलापन लाना। पश्चिम देश इस खुलापन से ऊब चुके हैं। वे अब परिवार की ओर लौटना चाहते हैं। कम होती जनसंख्या से चिंतित पश्चिमी जगत और जापान, कोरिया और रूस से जैसे देश अब परिवार में अधिक बच्चे पैदा करने पर जोर दे रहे हैं।

कल ही किसी ब्लाग पर पढ़ रहा था कि जर्मनी में मृ्त्यु दर जन्म दर से अधिक है। पश्चिमी देशों में बूढ़ों की संख्या बढ़ रही है। हम अपने देश में बढ़ती हुई जनसंख्या को बोझ मानते हैं। हम सबसे गलत चीज अपने अविकसित होने के लिए बढ़ी हुई जनसंख्या को देते हैं।
हमारा मानना है कि बढ़ती जनसंख्या से ज्यादा हम अपने गिरते वैचारिक स्तर के कारण पिछड़े हुए हैं। हम पश्चिमी जगत की अच्छी चीजों को दरकिनार को नंगापन को अपनाना ही आधुनिक होने का अहम चिह्न मानते हैं। जबकि आधुनिक होने का मतलब होता है विचारों में समृद्ध, जिसके सामने सारी समस्याओं धूल की मिट्टी की तरह खत्म हो जाये।

आज पश्चिमी देशों के युवा जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं, इसलिए परिवार या बच्चे की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते। इस कारण वहां जन्म दर घटती जा रही है। हमारे यहां भी उन्हीं की जीवनशैली को अपनाते हुए महानगरों में विवाह जैसी संस्था को धकियाने का काम किया जा रहा है। अगर हम खुलेपन को आबादी के घनत्व से जोड़ कर देखेंगे या देखते हैं, तो इसका सीधा मतलब सेक्सुअलिटी से जोड़ना होता है। जनाब खुलापन इस विवादास्पद मुद्दे से कहीं आगे बढ़कर सोचने की चीज है। खुलापन मतलब विचारों में पारदर्शिता होती है। जहां समाज में कोई भेदभाव नहीं हो और न ही किसी प्रकार का ऐसा विवाद हो, जिससे किसी की भावना को ठेस पहुंचे।

हमने मिनी स्कर्ट, जींस और टॉप को ही आधुनिकता की पहचान बना दी है। एक महिला कीआधुनिकता साड़ी में भी झलक सकती है। ये हम भी जानते हैं और आप भी। अब ये मत कहियेगा कि इतने ही उन्नत अगर आपके विचार हैं, तो आप धोती क्यों नहीं पहनते?

11 comments:

Neeraj Rohilla said...

आज पश्चिमी देशों के युवा जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं, इसलिए परिवार या बच्चे की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते।

अच्छाजी, पश्चिम में भी कोई मैकाले हुये थे क्या?

Dr. Munish Raizada said...

आपने अच्छा विश्लेषण किया है.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

खाली खुले पन और वैचारिक परिवर्तन से भी काम नहीं चलने वाला। भौतिक परिवर्तन जीवनावश्यक पदार्थों का जन जन की पहुँच में आना भी जरूरी है।

रचना said...

हमने मिनी स्कर्ट, जींस और टॉप को ही आधुनिकता की पहचान बना दी है। एक महिला कीआधुनिकता साड़ी में भी झलक सकती है। ये हम भी जानते हैं और आप भी। अब ये मत कहियेगा कि इतने ही उन्नत अगर आपके विचार हैं, तो आप धोती क्यों नहीं पहनते?

yae likh kar aapne khud apni kahii har baat ko jhudlaa diya

hamaarey yaahaan yahii samsyaa haen ki har baat jo khulaaepan sae sampbandhit hotee haen wo aakar
aurat / naari kae libaas par kahatam hotee haen

kuch upar uthiyae apni is soch sae
kis ko kyaa pehnanaa haen yae uska samvaedhanik adhikar haen

meri psot ka link daene kae liyae aabahr

डॉ .अनुराग said...

इसका एक बहुत बड़ा कारण अशिक्षा है ....ओर कुछ धर्मो में चली आ रही घिसी पिटी दकियानूसी सोच जो उस वक़्त किसी खास कारण से बनायीं गयी थी .

परमजीत बाली said...

अच्छी विचारणीय पोस्ट है।बधाई।

prabhat gopal said...

hamne bahas ko aage badhaya aur aapne bhi bhagidari ki. sabko thanks


aaiye ham sakaratmak samvad kar ek nayi parampara shuru kare.

Anonymous said...

किसी भी देश की सभ्यता और संस्कृति सामान रूप से सम्मान्य है .न तो कोई संस्कृति हीनतर है और न ही श्रेष्ट.बात ऐसी है की जब हमारे यहाँ सभ्यता का विकास हो रहा था तो दूसरी जगह लोग घास नहीं छील रहे थे .
जब भी वेस्टर्न कल्चर की बात होती है तो हमारे मानसपटल पर सिर्फ अश्लील और अवज्ञाकारी भद्दे आचरण वाले लोगों का ही चित्र उभरता है .अपने मट्ठे को खट्टा न कहने वाले लोगों को ये बात समझना चाहिए की अच्छाई और बुराई हर सभ्यता में विद्यमान हो सकती हैं .सांस्कृतिक श्रेष्टता की लडाई लड़ने की बजाये क्यों नहीं हम एक दुसरे की संस्कृति से अच्छी चीज़ों को ग्रहण करें ?अभी भी हमारा देश जातीय ,नस्ली , धार्मिक और लिंग सम्बन्धी भेदभाव से मुक्त नहीं हुआ है. क्या हम पश्चिमी सभ्यता से वैसे खुलेपन को आयत नहीं कर सकते जो हमे कुप्रथाओं ,पुरातन रूढियों और अन्य अतिवादों की जकड से मुक्ति दिला दे .खुलेपन का मतलब खाली मिनिस्किर्ट और बिकनी का शारीरिक खुलापन नहीं बल्कि मर्यादित विचारों का खुलापन . हमारे देश में संसाधनों पर जनसँख्या का दबाव और असंतोष बढ़ता ही जा रहा है इसके बावजूद हम बच्चों को ऊपर वाले की देन बताकर लगातार आबादी बढाते जा रहे हैं.क्या हम पश्चिम से इस मामले में कुछ सीख सकते हैं?

दोपाया जंगली जानवर से आधुनिक मनुष्य बनने तक का सफ़र मनुष्य ने संयम के बल पर ही तय किया है क्यूंकि परिपक्वता के बाद देह्प्रदर्शन,शारीरिक सम्बन्ध , प्रजनन और गृहस्ती ही मनुष्यों के जीवन का मुख्य धेय्य हो जाए तो जानवरों और मनुष्य में अंतर क्या रह जायेगा?आजकल बढ़ती जा रही नग्नता का बच्चों पर खराब मनोवैज्ञानिक असर पड़ रहा है.मेरे विचार से परिधानों को अपनी सहजता के अनुसार जरूर पहनना चाहिए पर केवल नंगापन और देह प्रदर्शन नहीं होना चाहिए .अब हम संस्कृति के नाम पर ये कह कर किसी को बाध्य तो नहीं न कर सकते कि कोई धोती पहनकर सीमाओं की पहरेदारी करें ,कोई सारी पहनकर दौड़ लगाये या कोई बुरका पहनकर बैडमिन्टन खेले .

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

यह सही है कि बड़ी संख्या में नौजवान पीढ़ी भारत और चीन का प्लस प्वाइण्ट है।
पर बड़ी संख्या में बच्चे सूदान और सोमालिया का भी प्लस प्वाइण्ट है?

cmpershad said...

यहां जनसंख्या के हिसाब से आबादी तो बढेगी ही। दूसरी बात यह है कि गर्म देशों में अधिक गर्मजोशी होती है। इसीलिए तो रूस और जर्मनी जैसे देशों को अधिक बच्चों की मां को पुरस्कृत किया जाता है!!

Anita said...

आपकी पहेली कुछ पंक्तिया अच्छी लगी

'सारे सवालों का जवाब बस ये ही एक जवाब है। खुलापन का मतलब सिर्फ शारीरिक संबंध बनाना या स्वच्छंदता नहीं होता। खुलापन का मतलब होता है, विचारों में खुलापन लाना। '

खुलेपन या खुले विचारो का न परिवार न ही कपड़ो से कोई संबंध है| विचार तो आप की अंतरात्मा से आते है| बाहरी दिखावे से नही|

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