Friday, April 10, 2009

भुला दिया गया तापस, लोकसभा चुनाव और हमारा आज

हमारे झारखंड में हजारीबाग संसदीय क्षेत्र चुनाव की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण और रोचक है। भाजपा से यशवंत सिन्हा, कांग्रेस से सौरभ नारायण, वाम दल से भुवनेश्वर मेहता और झाविमो से बीके जायसवाल प्रमुख उम्मीदवार हैं। हजारीबाग इससे पहले भी एक बार चर्चा में आया था, लेकिन वह चर्चा एक घटना को लेकर थी। तापस सोरेन द्वारा आत्मदाह करने की घटना को लेकर।

तापस ने नरेगा योजना में बरती गयी धांधली से आहत होकर आत्मदाह कर लिया था। बाद में दिल्ली में उसने इलाज के क्रम में दम तोड़ दिया था। चुनावी रिपोर्टिंग के क्रम में रिपोर्टरों को तापस के माता-पिता से मिलना हुआ। बूढ़े हो चुके माता-पिता बदहाल जिंदगी जीने को विवश हैं। गरीबी, तंगहाली और विवशता उनकी नियति बन चुकी है। झारखंड जैसे राज्य में हजारों तापस हैं। हजारों ख्वाहिशें रोज दम तोड़ रही हैं। उसी हजारीबाग में हर उम्मीदवार विकास के वायदे करते हुए वोट मांग रहा है। लेकिन तापस को याद नहीं किया जा रहा है। न ही तापस जैसे गरीबों के लिए क्या किया जाये, इस पर बहस हो रही है। कुछ दिनों पहले चतरा जिले में अति पिछड़े आदिवासियों की खराब हालत को लेकर भी बवाल मचा था। चतरा झारखंड के उग्रवाद प्रभावित जिलों में है।

नक्सल प्रभावित इस जिले के प्रखंड विकास की बाट जोह रहे हैं। झारखंड राज्य के दस से ज्यादा जिले उग्रवाद प्रभावित हैं। यशवंत सिन्हा इसके पहले के चुनाव में हार चुके हैं। इस बार के चुनाव में उन्होंने शायद प्रचार-प्रसार में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। हमारे देश में दस सालों में भाजपा और कांग्रेस दोनों को शासन का मौका मिला। दोनों ने उदारीकरण को आगे बढ़ाया। लेकिन इंटरनल सिक्यूरिटी के मामले में दोनों ही दल विफल रहे।

मामला अगर विकास से इतर सुरक्षा को लेकर देखा जाये, तो ये दोनों ही दल इस मामले में दोषी करार दिये जायेंगे। बम विस्फोटों के हादसों के दौरान गृह मंत्री के पहनावे से लेकर बाद के दिनों तक उभरे कई प्रश्न भुला दिये गये हैं। लेकिन ये रह-रह कर मतदाताओं को उनकी दयनीय हालात के बारे में बता जाते हैं।

वोटरों को मत देने से पहले इन बातों को तौलना होगा कि उन्हें कैसी और किसलिये सरकार चाहिए। आप ब्लाग लिखिये या किसी भी पार्टी की निंदा कीजिये, लेकिन हमें और आपको तापस के स्तर पर खड़ा होकर आगे की सोच रखनी होगी। जब सुख सुविधा से संपन्न लोग बहस और विचार विमर्श के दौरान सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और सिद्धांतों के बारे में जानकारी देते हैं, तो मन तड़प उठता है। क्योंकि राज्यों के सुदूरवर्ती प्रखंडों में अधिकारी या निजी कंपनियों के लोग नहीं जाना चाहते।

विकास भी सिर्फ गांव से दूर होते हुए शहरों तक सिमट कर रह गया है। वैसे में एक बार फिर कम से कम चुनाव के बहाने इस सच्चाई से हम यदि रू-ब-रू हो लें, तो क्या ये ही काफी नहीं होगा? शुतुरमुर्ग बन जाने से बेहतर है, सच्चाई जान लेना।

1 comment:

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

जनजातीय वोटों पर जनजातीय नेता एक छत्र राज कर झारखण्ड को गर्त में ले गये हैं। बेशुमार धन भी आ गया है इन ट्राइबल लीडर्स के पास।
लिहाजा जनजातीय बदहाली के लिये क्या आंसू बहायें।

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