Tuesday, June 30, 2009

बदलाव के साथ बदलना जरूरी है

एक विग्यापन में एक संदेश लिखा जाता है कि परिवर्तन खुशियां लाती हैं। हर परिवर्तन में हर रोज कुछ रस, कुछ सोच छिपे रहते हैं। हम उस परिवर्तन के साथ खुद को कितना बदल पाते हैं, ये सबसे बड़ी बात है। जो नहीं बदल पाते हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। बेचारगी का भाव लिये कब तक जिंदा रहिएगा, ये सोचनेवाली बात है। रह-रहकर नुक्तचीनी करते हुए कितने दिनों तक आप किसी बात की सकारात्मकता को पकड़ सकते हैं। मेरे हिसाब से हमारे लिए ये जरूरी है कि हम ये जान लें कि कौन सी चीज हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है। अखबार की दुनिया में रोज परिवर्तन से वास्ता पड़ता है। रोज ऐसी घटनाओं या लोगों से टकराना होता है, जो एकदम नए होते हैं। वैसे में मुंह टेढ़ा करना न्यायसंगत नहीं लगता, लेकिन छुप कर बैठना भी सुहाता नहीं। इसलिए उस परिवर्तन के साथ उस दिन के काम को सलटाने में लग जाता हूं। ये ही प्रक्रिया लगातार जारी रहती है। वैसे ही देश में कास्मोपॉलिटन कल्चर के विकसित होते स्वरूप में जब धार्मिक उन्माद के स्वरूप को जिंदा रखने की कोशिश से रूबरू होता हूं, तो एक चुभन सी होती है। आखिर हम इतने अंधे क्यों हो जाते हैं। पड़ोसी देशों में घट रहीं घटनाओं से शर्म से सिर झुक जाता है। वैसे ही उनके हमकदम होते हुए जब कुछ लोग अपने देश में ज्वार लाने की कोशिश करते हैं, तो आह निकल पड़ती है। वैसे में जो हालिया परिवर्तन हो रहा है, उसे महसूस करने या सूंघने में हमारे नेता क्यों विफल रह जाते हैं। परिवर्तन के साथ सामंजस्य बैठाने की विफलता ने कई नेताओं को हालिया चुनाव में औकात बता दी। परिवर्तन को महसूस करना एक कला है। जो इस परिवर्तन को पकड़कर उसके अनुसार खुद को ढाल लेता है, आखिर में जीतता वही है। वैसे भी पुरानी कहावत है, जैसन बहे बयार, तइसन मुंह करी। जिधर हवा का रख देखो, उधर मुंह कर लो।

1 comment:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

logon ko jo chahiye wo mil raha hai, kaun desh ke naam par, vikaas ke naam par, swabhimaan ke naam par vote deta hai??? jis ke naam par dete hain wo unhe mil raha hai! bhagat singh, rajguru, bose, roshan singh, lahiri, aajad inke vanshajon ko koi jaanta hai??? satta ki malai jo chat rahe hain wo inhen saamne lana hi nahi chahte! babool bokar aam kahan se milenge!

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