Saturday, July 11, 2009

फेसबुक तुम्हें हमारी दोस्ती का सलाम।


एक सवाल फेसबुक को लेकर उठा। फेसबुक यानी सोशल नेटवर्किंग साइट, जिसकी जादू से हम क्या, बड़े-बडे़ नहीं बच पाए। एक बात बताइए, क्या हम सिर्फ उन्हीं अतीत के लोगों को अपने दायरे में रखेंगे या बातचीत के लिए चुनेंगे, जो हमारे संपर्क में रहे या हैं। सवाल ये है कि आपका नजरिया क्या है? जब सोशल नेटवर्किंग साइट का आप उपयोग करते हैं, तो अनायास ही आप सैकड़ों लोगों से जुड़ते चले जाते हैं। ये एक नहीं रुकनेवाला क्रम है।

सबसे बड़ी बात है कि दोस्ती के मर्म को समझना कठिन है। निजी जिंदगी में दोस्त हमेशा सुख-दुख की भावना का ख्याल रखते हैं। वैसे में फेसबुक पर जो दोस्त बने हैं, उनसे वैसी ही भावना की अपेक्षा करना क्या उचित है? मैं तो हर उस दोस्ती के आग्रह को स्वीकार करता हूं, जो मेरे पास आता है। मेरा मानना है कि अगर कोई मेरे लिए बुरा है, तो मैं क्यों दूसरों के लिए बुरा होऊं। मैं न तो त्याग की अपेक्षा करता हूं और न ये सोचता हूं कि अगला फेसबुक का दोस्त मेरे हर सवाल का जवाब देगा। अपने स्टेटस पर जवाब पाने या किसी संदेश के जवाब के लिए जबरदस्ती नहीं की जा सकती। अगर किसी ने दोस्त बनने के लिए निमंत्रण दिया है, तो हमें उसे स्वीकार करना चाहिए, ये हमारा दायित्व और फर्ज भी है।

वैसे भी निजी जिंदगी में कम ही मिलना हो पाता है, वैसे में अगर आधे-एक घंटे में किन्हीं दो-चार व्यक्तियों के साथ मन की बातें शेयर कर लीं, तो कौन सी खराब बात हो जाती है? राह चलते किसी व्यक्ति को बुलाकर मित्र बनाने का चलन तो नहीं है। लेकिन अगर आप मित्र बनाना चाहें, तो भी वह आपके स्टेटस को देखकर मित्र बनेगा। ऐसे में फेसबुक पर लोग सिर्फ एक सहज आकर्षण में बंधकर अगर मित्र बन जाते हैं, तो बुरा क्या है।

मेरे मित्रों की संख्या दो सौ पार चली गयी है, इच्छा है और बढ़े। कम से कम मेरे नाम से इतने लोग परिचित तो हैं। कौन जानता है कि जिंदगी के किस मोड़ पर कब कौन किस परिस्थिति में कहीं मिल जाए। एक संवेदनशील इंसान होने के नाते मुझे फेसबुक आकर्षित करता है। दो लाइन की उसकी स्टेटस में वो दम होता है, जो हजारों शब्दों में नहीं। आपकी सोच को सिर्फ एक तीर से मित्र बनें सैकड़ों लोगों के सामने परोसा जा सकता है। अपने मन की भड़ास को बिना गरियाए चुपचाप स्टेटस में डाल आप चुप बैठ सकते हैं। साथ ही दोस्तों की प्रतिक्रिया भी जान सकते हैं। कम से कम आपका नजरिया लोगों के विचारों को जानकर विस्तृत होता है।

सबसे जरूरी चीज संवाद करना है। जितना संवाद करिएगा, आपका दायरा और सीमा क्षेत्र उतना फैलेगा। इसलिए अपने संवाद के दायरे को विस्तृत होने दीजिए। मेरे जितने भी मित्र बने हैं, मुझे किसी से कोई गिला शिकवा नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है कि किसी ने कम से कम मित्रता के प्रस्ताव को तो स्वीकारा। जहां रिश्तों का अंधेरा हो और रिश्ते मर रहे हों, वहां एक छोटे से दीए का जलना भी सुकून दे जाता है। फेसबुक तुम्हें हमारी दोस्ती का सलाम।

3 comments:

अजित वडनेरकर said...

प्रभात गोपाल झा नाम के जो सज्जन इस मेल को खोलते पाए जाते हैं उन्हें हम ये कहना चाहते हैं कि बीते दो सौ दिनों की ये सबसे अच्छी पोस्ट हमें लगी है।

वो चाहें तो असहमत हो सकते हैं:)

Udan Tashtari said...

हम तो यह मानते हैं कि इन सब जगहों पर भी स्व विवेक और संयम की दरकार होती है.

शरद कोकास said...

प्रभात जी, शब्दों का सफर वाले अजित वडनेरकर जी मेरे मित्र हैं और मैं फेसबुक पर इन्ही के आमंत्रण के फलस्वरूप पहुंचा . आज मेरे परिवार में पारिवारिक मित्र की तरह अजित जी के बारे में बात होती है जबकि आज तक हम लोग रू-ब-रू मिले नहीं हैं. सफर से ही याद आया कि रेल के सफर मे भी हम लोगों से मिलते है और जरा सी देर मे अपने सारे सुख- दुख उनसे कह देते हैं और फिर दोबारा उनसे कभी नही मिलते. यहाँ फेस बुक पर ऐसा होने की कोई सम्भावना नही है बल्कि यहाँ तो कभी ना कभी प्रत्यक्ष मिलने की उम्मीद है किसी कवि ने कहा है.."छोटी सी ये दुनिया पहचाने रास्ते हैं,कभी तो मिलेंगे कहीं तो मिलेंगे तो पूछेंगे हाल."

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