Monday, August 3, 2009

अब तो बस एक चीज कहने को जी करता है, जाने भी दो यारों।

न तो मैं साहित्यकार हूं और न साहित्य का जानकार। साहित्य तक अंदर पैठ भी नहीं है। रोजमर्रा की खबरों के बीच जीता जागता और सच का सामना करता एक मीडियाकर्मी हूं। वैसे में साहित्य और साहित्यकार को लेकर ब्लाग जगत में यूं ही भिड़ंत जैसे रोजमर्रा की चीज हो गयी लगती है। मुझे ये नहीं पता कौन क्या और किस श्रेणी में है। शायद यहां रांची में बैठकर दिल्ली की साहित्यिक गतिविधियों की तस्वीर नहीं खींची जा सकती। लेकिन इतना जानता हूं कि आज की पीढ़ी, जो मेरे से दस या १२ साल भी छोटी है, उन्हें आज की दुनिया में साहित्य की गंभीर बात तो दूर, सामान्य अखबार के संपादकीय पेज को पढ़ने के लिए फुर्सत नहीं होती दिखती। वह जमाना कुछ और था, जब ज्यादातर युवा सिविल सेवा को टारगेट करते हुए भाषा को लेकर संजीदा हुआ करते थे।

इसी कारण पहले जैसी कितनी गंभीर पत्रिकाओं को आप या हम बिकते या निकलते पाते हैं। जीवन के तकनीकी पक्ष में ज्यादा रोजगार के अवसर उत्पन्न होते जा रहे हैं। इसलिए संस्कृत, हिन्दी जैसे भाषा के छात्र भी लगातार कम हो रहे हैं। गंभीर छात्र भी नहीं मिल पाते। जो सच्चाई हैं, उससे दुनिया और हम वाकिफ है। लेकिन अपने खुद के बनाये शीशे के घर में, वो भी काले रंग से दीवारों को रंगकर, हम सभी सपनों की दुनिया में बहस में उतर पड़े हैं। मैं एक बात सही तौर पर कहना चाहूंगा कि साहित्य की दुनिया को लेकर जो भी बहस ब्लाग जगत में होती है, उनमें तनिक भी रूचि नहीं है। मैं खुद को इस बारे में पूरी तरह से परिपक्व भी नहीं मानता।


लेकिन ये सोचने को मन विवश होता है कि जो लोग तथाकथित बौद्धिक जुगाली करते हैं, वे क्या बौद्धिकता के नाम पर सचमुच इतने परिपक्व हैं? यदि परिपक्व हैं, तो फिर उन्हें इतना बताने की क्या जरूरत आन पड़ती है कि देखो हममें इतनी योग्यता है। या कोई भी व्यक्ति, जो दावा करता है कि उसे साहित्य या उसके श्रेष्ठतम स्तर का जरा सा भी भान है, दूसरे पर सीधे तौर पर कीचड़ उछालता है।

जो रचा जा रहा है, वही तो साहित्य होता है। आज से २० साल बाद के युवा को अगर आप विशुद्ध हिन्दी के शब्दों के साथ साहित्य का मर्म समझायेंगे, तो शायद किनारे खड़े होकर खुद से ही बातें करते पायें। इसी तरह जो लोग २० साल पहले के साहित्य को लेकर आज के ब्लाग जगत पर बहस का पुलिंदा लिये बैठे हैं, उन्हें भी साहित्य को लेकर नयी परिभाषाएं गढ़नी होगी। सबसे अहम तो ये होना चाहिए कि भाषा को आम आदमी के अंतिम कतार तक पहुंचा दिया जाये। आप काफी विद्वान हैं, तो आपकी विद्वता क्या, सिर्फ अखबारों के पन्नों, किताबों और विश्वविद्यालय परिसर में सिमट कर रह जानी चाहिए।

दूसरा सवाल जो महत्वपूर्ण है, वह ये है कि साहित्य, साहित्यकार और मठाधीशी के नाम पर ब्लाग पर जो टुच्चा किस्म की राजनीति दिखती है, वह खतरनाक है। इससे तो आप दूसरे का वक्त जाया करते ही हैं, खुद का भी वक्त खराब करते हैं। ब्लाग को जेनरल यानी गंवई, जो पूरी तरह बौद्धिक जुगाली नहीं कर पाते हैं, उनके लिए रहने दीजिये। कैसे और किस स्तर पर भाषा होगी, कौन साहित्यकार कैसा होगा? याकिसे पसंद किया जाये, ये समय पर छोड़ दिया जाये। आज २४ घंटे में व्यक्ति के रात के सात से दस बजे तक टीवी के सामने गुजरते हों, तो सामान्य दिनचर्या में साहित्य, वह भी गंभीर, पढ़ने का वक्त कहां है?

अब तो बस एक चीज कहने को जी करता है, जाने भी दो यारों।

8 comments:

AlbelaKhatri.com said...

umdaa baat
saadi lekin gahri baat
aatmsaat karne yogya baat
____baat me baat hai....

badhaai !

Dr. Smt. ajit gupta said...

साहित्‍यकारों के इसी अहंकार के कारण तो आमजन से साहित्‍य गायब हो गया है। ये मुठठी भर लोग आपस में ही एक दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहते हैं और गुटबाजी करके किसी और को जमने नहीं देते हैं।

चंदन कुमार झा said...

बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्नों को उठाया है आपने......शायद उत्तर भी इतना सरल हो. आभार.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

आपका कहना बहुत हद तक ठीक है,लेकिन साहित्य को टेलीविजन और कम्प्यूटर ने मार दिया.

Udan Tashtari said...

कैसे और किस स्तर पर भाषा होगी, कौन साहित्यकार कैसा होगा? याकिसे पसंद किया जाये, ये समय पर छोड़ दिया जाये।

-ये ही करना चाहिये. समय निर्धारित करेगा.

विनीत कुमार said...

आपकी बात से बिल्कुल सहमत नहीं हूं खासकर साहित्य पढ़नेवाले छात्रों और पत्रिकाओं के मामले में। माफ कीजिएगा,आपकी इस पोस्ट में तथ्यों की कमी साफ झलकती है। जब मैं हिन्दू कॉलेज में हिन्दी पढ़ने आया था तो कटऑफ 65 प्रतिशत रही। अब अस्सी प्रतिशत लेकर लोग हिन्दी पढ़ने आते हैं। आपको अंदाजा नहीं है,कभी एडमीशन के वक्त दिल्ली सहित देश के दूसरे हिस्सों में जाकर देखिए,आपको अंदाजा लग जाएगा कि पहले के मुकाबले साहित्य पढ़नेवालों की संख्या बढ़ा है या घटी है। बात रह गयी ब्लॉग पर टुच्चेपने की तो आप इलिटिसिज्म के शिकार हैं।
आप खास तरह की शुद्धतावादी मानसिकता से ग्रस्त हैं जो की मठाधीशी की बुनियादी समझ है। पहले के मुकाबले साहित्य ज्यादा डेमोक्रेटिक हुआ है,हाशिये के लोग की आवाज शामिल हुई है,अगर इससे साहित्य में टुच्चापना आया है तो मुझे इस पर खुशी है।

PD said...

Filhal yahan main Vinit se jyada sahmat hun..

हिमांशु । Himanshu said...

कुछ बाते निश्चिततः ही महत्वपूर्ण हैं - पर विनीत जी का कहना भी सही है । अन्यान्य कारणों से साहित्य का अध्ययन बढ़ा ही है ।

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