Wednesday, August 5, 2009

क्या आप सामाजिक विस्फोट के लिए तैयार हैं?

आज के हालात में मीडिया समीक्षकों और सामाजिक चिंतकों के लिए जो बातें सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं, उसमें है गर्भनिरोधकों का खुलेआम प्रचार। वह भी साइड मेडिकल इफेक्ट की चर्चा किये बिना। ये ७२ घंटे में मसले को सलटाने का दावा करते हैं। एक अंगरेजी में प्रकाशित रपट के अनुसार जिन युवतियों द्वारा ज्यादा इनका इस्तेमाल किया जा रहा है, उन्हें स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

Unsupervised, over-the-counter use of 'emergency' contraceptive and abortive pills is leading to menstrual problems, reports The Times of India.

The paper reports that gynaecologists are encountering increased incidents of menstrual problems among young women who are arbitrarily and repeatedly using these pills as regular forms of contraception.

"They check dosage on the internet, do their own calculations. Not understanding the consequences, they land up with incomplete abortions. They are scared about the uncontrollable bleeding, or not getting their periods," said Dr. Shilpi Tiwari to The Times of India. He also said that more than half of her clients are between 18 and their early 20s, all with pill-related complications.


हम यहां ज्यादा मेडिकल हिस्ट्री की समीक्षा नहीं करेंगे, बल्कि जिस खुलापन का आह्वान करते हुए हो गयी तथाकथित आसान गलतियों का टीवी पर ग्लैमराइजेशन करते हुए प्रचार-प्रसार किया जा रहा है, उसकी बातें करेंगे।

एक एडवर्टाइजमेंट में जिस प्रकार से एक महिला किसी मित्र को ७२ घंटे के अंदर किसी गोली को खाकर गलती को मिटाने की सलाह देती है, उससे जो मैसेज जा रहा है, जो प्रचार हो रहा है, उसमें कुछ लोग कहेंगे कि ये तो जनसंख्या नियंत्रण का एक तरीका है। लेकिन जनसंख्या नियंत्रण की आड़ में जिस सामाजिक शिष्टाचार को तार-तार किया जा रहा है, उसका क्या किया जाये? संयम,मर्यादा और समझदारी भरे जीवन को जीने की तमन्नाओं को गला घोंटने के लिए सारी व्यवस्था कर ली गयी है।

इन्हीं सब विषयों को लेकर हमारे फिल्म निर्माता भी सजग हो गये हैं। टीन एज सेक्सुअलिटी को लेकर फिल्म बन रही है। उसका प्रोमो भी चल रहा है। सच का सामना ने तो हमारे-आपके मन में सड़ चुकी अंतरात्मा को सिर्फ उघाड़ने का काम किया है। ये एक तरह से गिरावट का प्रारंभिक स्तर है, जो अपने चरम पर पहुंचने के लिए बेताब है।

पूरी व्यवस्था में पानी कहां से लायें, शिक्षा का पैमाना क्या हो, स्वास्थ्य व्यवस्था अंतिम व्यक्ति तक कैसे पहुंचे, जैसे विषयों को लेकर कहीं कोई गंभीर बहस नहीं दिखती। सेक्स और इससे जुड़े विषयों पर चर्चा हो, लेकिन जिस अगंभीर और सतही स्तर पर इसे लेकर व्यावसायिक मापदंड अपनाया जा रहा है, उसका कोई उपाय नहीं दिखता।

जिस तकनीक का इजाद मनुष्य की प्रारंभिक अवस्था में पूरी जानकारी के लिए क्या जा सकता था, उसका इस्तेमाल कन्या भ्रूण हत्या के लिए हो रहा है। बिगड़ते संतुलन का असर भी कुछ राज्यों में दिखने ही लगा है। उसी तरह सेक्स जैसे विषय को लेकर जिस प्रकार बकवास से पूर्ण व्यावसायिक नजरिया अपनाया जाता है, उससे मन हिल रहा है। अब सीरियल और टीवी पर भी पूरी उलट संस्कृति को परोस दिया जा रहा है।
जोश और जुनून से भरी जिंदगी को सिर्फ एक ही चीज पाने के लिए नहीं जिया जाये, ये संदेश देना जरूरी है। नहीं तो सामाजिक विस्फोट के लिए तैयार रहें, जिसके बाद सामाजिक व्यवस्था को बिखरते देर नहीं लगेगी।

5 comments:

परमजीत बाली said...

आप की बात सही है यदि यू ही चलता रहा तो समाजिक विस्फोट तो होगा ही....लेकिन आज अर्थ की दोड़ में यह सब नजर नही आ रहा.......कई बार लगता है जिस तक यह संदेश पहुँचना चाहिए उस तक तो पहुँचता ही नही.....लेकिन ऐसे लोगों तक पहुँच जाता है जो इस का गलत इस्तमाल ही कर सकते हैं....

‘नज़र’ said...

आपकी बातों से पूर्णतया सहमत, यह उत्प्रेरक लेख है
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'विज्ञान' पर पढ़िए: शैवाल ही भविष्य का ईंधन है!

अंशुमाली रस्तोगी said...

सबकुछ टीवी या फिल्मों का ही दोष नहीं है, काफी कुछ हमारी सोच का भी है। पता नहीं हम सोच से कब आधुनिक बनेंगे?

चंदन कुमार झा said...

सुन्दर आलेख. उचित प्रश्नो को उठाया है आपने.आभार.

गुलमोहर का फूल

indian citizen said...

yah to galti karne ko protsahit karne wali baat hai.

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