Friday, August 7, 2009

स्ट्रगल टाइप माइंड सेट क्या होता है?

रविश जी की पोस्ट पढ़कर लगता है जैसे स्ट्रगल करने का जो शगल लोग बयां करते दिखते हैं, वह मायावी है। वैसे
तो फिल्मों में स्ट्रगलरों को महिमा मंडित करते पाते थे। वहीं से स्ट्रगल शब्द को भी अपनी उच्च मानसिक अवस्था में पचा सका। आप मानिये या न मानिये, लोग अंगरेजी में स्ट्रगल कर रहा है या हूं, कहकर खुद को संतोष के उच्च स्तर पर ले जाकर बैठा देते हैं। २० साल बाद अपने जूनियर को समझाते हैं कि हमने भी स्ट्रगल किया है या किया था। जबकि यथार्थ में कोई भी उस सफलता या प्रोफेशन के शिखर पर एक दिन में नहीं पहुंचता है, उसे भी सीढ़ियां चढ़नी होती हैं, एक-एक कर।

सच कहें, तो जिस मानसिक संताप की बात रविश जी ने की है, वह तो हर किसी के मन में है। दिल्ली, मुंबई या कहीं और जाकर ठौर तलाशते हुए नौकरी करना किसी संघर्ष से कम नहीं होता। उस संघर्ष में सिर्फ एक अदद नौकरी को कायम रखने की जद्दोजहद नहीं होती, बल्कि खुद को और अपने परिवार को बेहतर जीवन देने की जो कठिन राह पर आदमी चलता रहता है, उसका सारा निचोड़ उसमें होता है।

हम यहां अपने शहर में बैठकर सचमुच में संघर्ष नहीं कर पाये। माता-पिता के साथ रहते हुए नौकरी करते हुए उन सारे संघर्षों को नहीं झेला, जो और भाई-बहन दूर रहकर झेलते हैं। पहले जब लोग खुद अपने राज्य या शहर में नौकरी पा जाते थे, तो उन्हें ये सब नहीं झेलना पड़ता था। संघर्ष या स्ट्रगल कोई एक पत्रकार या मीडिया का आदमी ही नहीं करता है, वह ठेले पर फल बेचनेवाला या रोजमर्रा की दिहाड़ी करनेवाला भी करता है।

फर्क सिर्फ इतना होता है कि रोजमर्रा के संघर्षों को एक दिहाड़ी मजदूर ग्लैमराइज नहीं कर पाता है। उसके पास वैसे माध्यम नहीं है। ही हमारे वर्ग के लोगों को उनका जीवन दिखता है। खासकर हम पत्रकार अपनी जिंदगी में इस मुगालते में रहते हैं कि हमारा जीवन ज्यादा कष्टप्रद है। हम ज्यादा काम करते हैं। हममें योग्यता औरों के मुकाबले कुछ ज्यादा है। हमें और पाना चाहिए। हममें अपनी योग्यता को लेकर एक छद्म अहंकार रहता है। सीखते रहने की चेष्टा कहीं खत्म हो गयी लगती है। इसलिए जब चेष्टा खत्म हो जाये, तो शरीर और मन निष्क्रिय हो जाता है। साथ ही वह ये बोध कराता है कि आप हार चुके हैं ये जंग। तब हम घिसट-घिसट कर चलती जिंदगी को संघर्ष का नाम दे देते हैं।

जरूरत बस इस जिंदगी में थोड़ा और एक्स्ट्रा करने की है। जो यहीं कहीं हमारे अंदर से आयेगी। ब्लाग लिखना भी उसी का अंग है। आप मानिये या न मानिये, जब किसी गरीब छात्र को आइएएस या आइआइटियन बनते देखता हूं, तो अपना ये स्ट्रगल छोटा लगता है। खासकर हिन्दी टाइप लोगों ने हिन्दी सिनेमा के सहारे जो ग्लैमराइजेशन इस शब्द को दिया है, वही आज उनके लिए सबसे बड़ा नासूर बन बैठा है।

मारो गोली स्ट्रगल टाइप माइंड सेट को और कहो - बी पोजिटिव यार। आज की जिंदगी तो जी लो, कल की कल देखेंगे

1 comment:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

कल का ख्याल अगर पूर्वजों ने न रखा होता तो आज हमें यह न मिला होता.

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