Friday, August 28, 2009

हे विद्वान ब्लागरों हमारी संवेदना को जानो, भाषा की गलतियों को नहीं

भाषा कैसी होना चाहिए, शुद्ध, विद्वतापूर्ण और कठिन शब्दों से भरी हुई। ब्लागिंग करनेवाले ज्यादातर लोग इसी बात को बताने की शायद कोशिश कर रहे हैं कि हिन्दी ब्लाग जगत में ऐसे टुच्चे किस्म के ब्लागर आ गये हैं कि मूर्ख को मुर्ख और क्योंकि को क्योंकी लिख रहे हैं। ब्लाग पर भाषा की दीवार खड़ी करने की एक और कोशिश।

बहुत से ऐसे लोग भी ब्लागिंग की दुनिया में होंगे, जो कभी नहीं लिख पाते होंगे। भाषा क्या, किताबों से उनकी मित्रता बीते जमाने की बात होगी।वे संयोग से ब्लागिंग की दुनिया में कूद पड़े हों। कम्युनिकेशन या संवाद के लिए क्या जरूरी है, एक शब्द, एक संकेत या एक चित्र कुछ भी। अब आप उसमें भी गुण दोष निकालने लग जा रहे हैं। यही बात यहां चुभ जा रही है। कृपा करके ब्लाग जगत को मठाधीशी की परंपरा से मुक्त कर दें

आप सर्वग्य (यहां तकनीकी त्रुटि से सही नहीं लिख पाया माफ करें), सर्वग्यानी, विद्वान होंगे, लिखते होंगे और दूसरों से भी विद्वान होने की अपेक्षा करते हैं। जबकि मैं किसी भी ब्लागर से विद्वान होने की अपेक्षा नहीं करता हूं। सिर्फ सोचता हूं कि वे बेहतर तरीके से संवाद करें, चाहे टूटे-फूटे शब्दों में ही सही। अगर कोई अंग्रेज भी हिन्दी में ब्लागिंग करते हुए टुम जाता है लिखे, तो मुझे खुशी होगी।

पता नहीं क्यों, पुराने हो चुके ब्लागर दूसरों को सीख देने की परंपरा कायम रखे हुए हैं। पहले तो एक खास दायरे में ब्लागिंग कम्युनिटी को बांधने की कोशिश सत्यानाश करने के लिए काफी साबित हो रहा है। ऊपर से अब भाषा का बंधन। जब आदमी लिखना चालू करेगा, तो खुद ब खुद सही-गलत को जानने लगेगा। ब्लाग जगत में शुद्तावादी होने की कल्पना मत कीजिए।

जहां तक मेरा मत है, अंग्रेजी में भी ऐसा नहीं होता होगा कि कोई गलती नहीं होती होगी। जरूर होती होगी। ये बात अलग है कि हम भाषा की समृद्धि, ग्यान या अन्य दूसरी बातों को लेकर तुलना करने लगें।

ब्लागिंग तो बेलाग कहने के लिए है, कहने दीजिये। मन की धार को निकलने दीजिए। दूसरों को नसीहत देने की कवायद क्यों शुरू कर देते हैं? इसी में से शायद कोई विद्वान ऐसे भी निकल जायेंगे, जिन्हें ब्लागरों की शक्ल सूरत पर भी ऐतराज होगा।
आपके पास टॉपिकों की भरमार है, लिखिये, खूब लिखिये, लेकिन मीनमेख निकालने के लिए नहीं। हमारा मकसद भी आपका मीनमेख निकालना नहीं था, बल्कि ये एहसास कराना था कि ब्लागरों के इस महासमुद्र में मोती चुनने के लिए खुद को ही मर्मग्य क्यों लोग समझने लगे हैं।
मुझे तो बोलने को जी मचलता है

मैं ऐसा क्यों हूं, मैं वैसा क्यों हूं
जैसा भी हूं, बस ऐसा ही हूं
लिख देता हू , पढ़ लेता हूं
ग्रामर नहीं पकड़ पाता हूं
यहां पर है पूरी आजादी
अपना ब्लाग, अपनी बाराती
अगर आपको ऐतराज है हमसे
आप क्यों भिड़ते हैं हमसे?

19 comments:

AlbelaKhatri.com said...

बहुत अच्छी बात...........
सही बात...
ब्लॉगिंग पूर्णतः वैयक्तिक अभिव्यक्ति है
इस पर किसी अन्य का दबाव नहीं होना चाहिए,,,,,

रचना said...

Prabhat

hindi bloging mae aap ko jitnae log milagae jo dusro ki galtiyaa spelling ki bhasha ki bataatey haen aur apnae ko vidvaan kehtaey haen aap unkae blog par bhi vahii tankan ki galtiyaan paayegae . par ham aur aap likhey to ashudhi aur wo likhae tpo tankan ki galti


is kae allawa agar koi unpar kuch likh dae yaa aaina deekha dae to wo ek naa ekl blogger ko pakad kae aap kae upar post likhaa daetey haen ki aap hindi bloging ko barbaad kar rahey haen .

2 saal sae yahaan hun pehlae maere upar english kaa arop lagaatey the
phir roman kaa aur inki apni hindi aesi haen ki badae badae shabd likhaegae chahey uska matlab bhi naa pataa ho yaa uska asli matlab kuch uar ho

Vivek Rastogi said...

आपकि बात सहि है परंतू अगर कोइ ब्लोगर इस तरह कि गल्तीयां सतत करता है तो उसको टोकना हमारा नैतीक कर्तव्य है, जीससे उसे कम से कम यह तो पता चले की वह गलति कर रहा है और वह उसे सूधार सकता है। लोग तो केवल बोल ही सकते हैं बाद में उस ब्लोगर को पढ़ना बंद कर देगे, क्योंकी कीसि को भि अपनि मातृभाषा कि टांग तोड़ना पसंद नहिं आयेगा।

आपकि बात सहि है कि वैचारीक अभीव्यक्ती होनि चाइये,परंतु समझने वालि और बोलचाल वालि भाषा में अगर क्लीष्ट शब्द लीख देंगे तो कोइ क्या पड़ पायेगा।

ऊपर मात्राओं की गल्तियां लिखने में मुझे बहुत परेशानी हुई, उसके बाद उसे पढ़ने पर बहुत तकलीफ़ हुई, परंतु शायद आप मेरी बात समझ सकें।

अनूप शुक्ल said...

पुराने ब्लागरों के पास अब टोंकने के अलावा और कुछ बचा नहीं है। सो वे टोंकते रहते हैं। आप अपना लिखते रहिये मस्त, बिन्दास। जो होगा देखा जायेगा।

Arvind Mishra said...

अपनी कमजोरियों को ढाल देने के लिए ऐसे प्रलाप बंद होने चाहिए -अंगरेजी भाषियों में भी व्याकरण और वर्तनी की गलतियां अक्षम्य हैं ! किसी मुगालते में न रहिये भाई -परिश्रम करिए और जहाँ तक संभव हो भाषा की शुद्धता बनाए रखिये -चाहे वह कोई भी भाषा हो !
आप भाषायी गली कूंचों के स्लम डाग /बिच क्यों बनते हो ? माद्दा है तो भाषायी शेर शेरिनी बन दहाडों -मिमियाना बंद करो !

सतीश पंचम said...

भाई हमे तो इस बात से कोई फर्क नहीं पडता कि कोई वर्तनी में क्या कैसे लिख रहा है बस मूल भाव समझ आ जाना चाहिये। हां, बार बार गलती करते रहने पर थोडा सा टोका जरूर जा सकता है इसे मैं बुरा नहीं मानता।

मेरी एक पोस्ट में मैं बार बार मीडिया की जगह मिडिया लिख रहा था तब अरविंद मिश्र जी ने ही कहा कि मिडिया नहीं मीडिया लिखिये। भूल समझ में आई और उसे मैंने सुधार भी लिया। अब जब कोई स्नेहवश आपको कोई भूल सुधार कहने के लिये कहता है तो उसमें बुरा नहीं मानना चाहिये बल्कि उसे इस तरह लेना चाहिये कि आखिर कुछ जान कर , चाह कर ही तो गलती बताई गई है वरना आजकल इतना टाईम किसके पास है कि अपना टाईम खोटी कर दूसरे को कुछ सलाह आदि देते फिरे :)

मैं आपकी इस पोस्ट से कुछ हद तक सहमत हूँ पर पूरी तरह से नहीं।

अविनाश वाचस्पति said...

जो हटाना चाहते हैं गलतियां
उन्‍हें हटाने दो
जो नहीं हटाना चाहते
उन्‍हें मत हटाने दो
फिर आपका क्‍या रोल रहा
?

ब्‍लॉगिंग में इससे अधिक रोल
है ही नहीं
टिप्‍पणी कर सकते हैं
यह रोल कम तो नहीं।

जो जानना चाहता हैं
कैसे हटायें गलतियां
उन्‍हें जानने दो
जो नहीं मानते
गलतियां कर रहे हैं
उन्‍हें मत मानने दो।

विचार सामने आना
एक ब्‍लॉग क्रांति है
इस क्रांति को मत
बनने दो शांति जी।

Arvind Mishra said...

@और हाँ विवेक जी ने एक आईना दिया है उसमें अपना अपना मुंह आपकी विचारधारा के लोग देख सकते हैं और आपका प्रोफाईल मैंने पढ़ा -आप एक सम्मानित अख़बार में काम करते हैं ! यू टू ब्रूटस !
एक बात और अभी लखनऊ में एक कांग्रेसी नेत्री के भाषाई प्रयोग से तहलका मच गया था तो राहुल गांधी ने आपकी ही नसीहत दी थी -उनकी भावना सही थी मगर भाषा नहीं -इस बीच देवी जी का घर ही जला दिया गया ! हमें अपने घरों की चिंता करनी चाहिए !

वाणी गीत said...

बहुत सही कहा ...
मेरे ब्लॉग पर १४ जुलाई की पोस्ट को देखें .."ब्लॉग की नगरी माँ कुछ हमरा भी हक होहिबे करी "..
http://vanigyan.blogspot.com/2009_07_12_archive.html

Satyajeetprakash said...

जहां तक मुझे मालूम है, गलतियों पर टोकने का मकसद अपनी विद्वता बघारना कतई नहीं होता है, बल्कि लोग सही लिखने के प्रति आग्रह ज्यादा होता है. मुद्रित माध्यम से लोग सीखते हैं शब्द का स्पैलिंग, वाक्य विन्यास, लिंग निर्णय आदि. बार-बार देखने से यही याद रहता है और यही प्रयोग भी करते हैं. अगर बारबार गलत देखगें तो गलत ही लिखेंगे न. इसलिए टोकियाने वालों को गलत नहीं समझें बल्कि सही लिखने की कोशिश करें. अगर आप ज्यादा गलत लिखते हैं तो ब्लॉग में ऊपर ही सचेत कर दें.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

लखपत वकील अदालत पहुँचे तो चाल में लंगड़ाहट थी। जूनियर ने पूछा भाई साहब पैर में क्या हुआ ठीक तो हैं।
-हाँ बिलकुल ठीक हूँ। कहाँ लंगड़ा रहा हूँ?
जूनियर ने उन्हें लंगड़ाते हुए देखा था वह संतुष्ट न हुआ। उस ने लखपत जी के पैरों को ध्यान से देखा। बात समझ आ गई।
उस ने तपाक से कहा- भाई साहब आप दोनों पैरों में अलग अलग डिजाइन का जूता पहने हैं।
लखपत जी ने जूनियर को आँख दिखाई, वह चुप हो गया। शाम को दफ्तर में जूनियर को डाँट पड़ी। दोनों जूते अलग-अलग डिजाइन के थे यह सब के सामने कहने की क्या जरूरत थी। मुझे अकेले में चुपचाप नहीं बता सकते थे?

बी एस पाबला said...

जब आप अपने प्रोफाईल में लिखते हैं कि सीखने की ललक है और बस सीख रहा हूं। और फिर पोस्ट लिखते हैं ... हमारी संवेदना को जानो, भाषा की गलतियों को नहीं तो एक विस्मित कर देने वाला विरोधाभास होता है।

अरविन्द जी के कथन से सहमत हूँ कि माद्दा है तो ...दहाडों -मिमियाना बंद करो!

एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक के वरिष्ठ उप-संपादक से ऐसी पोस्ट की कतई उम्मीद न थी।

संजय बेंगाणी said...

यह विनम्र निवेदन है, कृपया अन्यथा न लें.

मैं चार साल से ज्यादा समय से ब्लॉगिंग कर रहा हूँ. आज जब पूरानी प्रविष्टियों को देखता हूँ तो शर्म आती है कि कितना अशुद्ध लिखता था. आज भी साथी ब्लॉगर टोकते रहते है, मगर जहाँ तक हो सकता है, वर्तनी दोष से मुक्त लिखने का प्रयास करता हूँ. क्योंकि शुद्ध लिखना एक कर्तव्य जैसा भी है. मगर ब्लॉगिंग मुक्त अभिव्यक्ति का माध्यम है. बिंदास लिखा जाना चाहिए, बिना भय के. मगर क्या सुधार के प्रति थोड़ा बहुत प्रयास भी नहीं करना चाहिए. मैं हिन्दी सीख रहा हूँ, हर पोस्ट के नीचे लिखता हूँ त्रुटियाँ बताएं. अखबार अय्र पत्रिकाएं ध्यान से देखता हूँ, और अगर एक अखबार का उप-सम्पादक ऐसी पोस्ट लिखेगा तो हम जैसे सीखने वालों का क्या होगा.

आपका ब्लॉग है, चाहे वैसे लिखें. टिप्पणी भी करते रहेंगे और पढ़ेंगे भी. सर्वज्ञ कोई नहीं है. अपराध वर्तनी दोष नहीं है, उसे न मानना है.

जी.के. अवधिया said...

हे अनुज,

आपके गप शप से अपनी गलती का हमें आभास हो गया है। अब उम्र में अधिक होने के कारण क्षमाप्रार्थना तो नहीं करेंगे, हाँ, अपनी गलती अवश्य मानकर कान पकड़ लेते हैं। प्रयास करेंगे कि भविष्य में ऐसी गलती न हो पाए।

संजय बेंगाणी said...

आपने जैसा लिखा है मैने भी लिखा था. यहाँ देखें : http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=266

[ आप और मैं ब्लॉगर हैं मगर क्या कभी आपने ऐसा सोचते हुए लिखा है? अगर हाँ तो ही हम ब्लॉगर है..की…

”वर्तनी की अशुद्धीयाँ है तो मेरी बला से..मेरा लिखा तुम्हे असाहित्यिक लगता है तो मेरी बला से, कौन मुझे सरकारी पुस्तकालयों में धूल खाने वाला साहित्य रचना है, मुझे तो मेरी भाषा में मेरे मन का लिखना है, पसन्द हो तो पढ़ो वरना “कलटी मारो”. मेरे लिखे का मूल्यांकन तो दो-तीन दशकों बाद होना है, इसलिए टिप्पणी देकर टिप्पणी पाने की कामना क्यों करते हो. मैं चिट्ठा इसलिए लिखता हूँ क्योंकि मुझे इसका तकनीकी ज्ञान है, मुझे हिन्दी छापना आता है. मुझे अपनी बात कहने के लिए किसी सम्पादक का मुँह नहीं ताकना पड़ता. जाओ भाई साहित्यिक चाहिए तो कहीं और जाओ, यह ब्लॉग है, जिसे मैं चिट्ठा कहूँ या बिलाग मेरी मर्जी.”

***

(यह तमाम नये ब्लॉगरों के समर्थन में और चिट्ठो में साहित्य खोजते स्वंयभू बौद्धिको के विरूद्ध लिखा है. ब्लॉगरों पर छींटाकशी नहीं होनी चाहिए न ही ब्लॉग में साहित्य को खोजा जाना चाहिए. यह एक आम इंसान की अपनी भाषा में अपनी अभिव्यक्ति है.) ]

Anonymous said...
This comment has been removed by a blog administrator.
Anonymous said...

mai sanjay ji ki baat se sahmat hoo aur unka purjor samarthan karta hoo.


aam blogger jindabad

blogging me sab saman hai

दरभंगिया (Darbhangiya) said...

अदरणिया परभात गोपल जि

अप जो काह रहे है वह उतन ही सही है जितना की यह टिप्पनि. लोगो को दुसरो कि ग्ल्ती बतने मे अचछा लग्ता है. आप ऐसे हि लीख्ते रहे, जिन्हे अचछा लागेगा वह पदेगे नही तो नही पदेन्गे.

शुभ काम ना

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

अब यह पोस्ट तो आपकी विद्वानों को समर्पित है. तो हम क्या कहूं!

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