Friday, August 14, 2009

क्या हम आपके शहर आ सकते हैं?

बड़े शहरों में रहनेवालों से पूछिये, क्या हम आपके शहर आ सकते हैं?

एक अनचाहा दर्द तपाक से चेहरे पर उभरता है,

अम्मा यार क्यों अपना बेड़ा गर्क कर रहे हो, छोटे शहर में ठीक हो। रईसी की जिंदगी है। वहां तो कोई जिंदगी नहीं।

ठीक कहा, जिंदगी जिसकी तलाश में हर कोई दिल्ली, मुंबई जाने की सोचता है। एक ख्वाब, जो हर किसी के मन के पंख पर सवार होकर उसे सपनों की सैर कराता है। शहरों की कहानी कहते लोग हमें अचरज में डाल देते हैं। दिल्ली में ऐसा है, मुंबई में ऐसा है...।

पर टीवी पर मुंबई, पुणे या दिल्ली में स्वाइन फ्लू, डेंगु या सड़क जाम की खबरें देखते हैं, तो कहते हैं कि बेहतर है हम छोटे शहर में हैं। लेकिन फिर जब कोई आकर बड़े शहर की बड़ी कहानी सुनाता है, तो मन डोलने लगता है।

हम तो आज तक ये फैसला नहीं कर पाये हैं कि आखिर बड़ा शहर अच्छा या हमारा छोटा शहर।

छोटे शहर के बड़े बनते जाने की कहानी के पीछे जो नासूरवाले घाव दिखते हैं, उसमें महसूस होता है कि गांव को छोड़ लोग शहर की बात क्यों कर रहे? भूखे पेट को अनाज चाहिए। आज खेती खराब हाल है। किसानी छोड़ लोग शहर में मजदूरी करते हैं बड़े शहर में। लड़कियां घरेलू काम कर पेट पालती हैं। छोटे शहर की अच्छी जिंदगी को छोड़ बड़े शहर में और अच्छी जिंदगी की खोज में रहती हैं। लेकिन टाइम तो निकल जाता है खोजने में। और रह जाती हैं यादें, संघर्षों के साथ जीने की बड़े शहरों में।

शायद इसी यादों के नासूर के कारण बड़े शहर के लोग कहते हैं-मत आओ मेरे बड़े शहर में, जहां हो वहीं रहो।

3 comments:

श्यामल सुमन said...

हर जगह का अपना मजा और दर्द है प्रभात जी। सच तो यह है कि हम जिन्दगी भर बातें करते रहते हैं पर जिन्दगी के बारे में अक्सर कम बातें होतीं हैं। अच्छा पोस्ट।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

चंदन कुमार झा said...

सही कहा है आपने. स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें. आभार.

sareetha said...

राँची देखने के बाद हम तो यही कहेंगे कि महानगरों से कहीं बेहतर हैं हमारे छोटे शहर । पूँजीवाद के तूफ़ान से अछूते ना सही कम से कम थोड़े बहुत बचे तो हुए हैं । दिल तंग भले ही हो चले हों , मगर बेदिली की नौबत नहीं आई है ।

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