Sunday, October 4, 2009

क्या आप हमारी खुशी को जानते हैं?


फोटो में बायें से तीसरी है खुशी

गांव में जिंदगी आज ठहर सी गयी है। मेरा गांव मेरे लिये कभी अजनबी नहीं रहा। क्योंकि वहां की मिट्टी की महक आज भी उसी तरह दीवाना बना देती है, जैसा पहले हुआ करता था। वहां की मिट्टी, वहां के पेड़, खींचते हैं। पता नहीं, क्यों गांव का आंगन आज सूना नजर आता है। खासकर बिहार में एक फैशन या मजबूरी बाहर बस जाने के कारण ऐसा हुआ है।

पहले आंगन में आज जैसा सन्नाटा नहीं होता था। लोग चहकते, गप्पे मारते मिल जाते थे। इन सन्नाटों के बीच कभी-कभी किलकारियों, मीठी हंसी की गूंज चमत्कृत कर देती है। मन गदगद हो जाता है। हमारी एक छोटी बहन है खुशी, तेज तर्रार और हाजिरजवाब। उसकी हंसी, उसकी तुकबंदी, उसकी बोली लोगों को विस्मित कर देती है।

दुर्गापूजा या अन्य किसी खास मौकों पर जब भी हम जुटते हैं, तो वह हमारी मार्गदर्शक बनकर हमें हमारी राह बताती चलती है। उम्र में छोटी खुशी उस समय किसी बूढ़ी अम्मी से कम नहीं लगती। उसकी सलाह, उसकी वाकपटुता सबको हरा देती है। लोग बचपन की मासूमियत और परिपक्वता के बीच के गणित को समझने की कोशिश करते हैं। लेकिन उसे जब तक समझने के लिए दिमाग लगाते हैं, तब तक उसके कई प्रश्न या कोई शरारत व्यक्ति का ध्यान दूसरी ओर ले जाती है। इस तरह दिन बीत जाता है और शाम को खुशी थककर अपनी दुनिया में चली जाती है। जहां परी और चांद, तारे उसके दोस्त होते हैं। बचपन की मिठास यकीनन खुशी में देखने को मिलती है।

हमारी यादों में खुशी हमेशा छायी रहती है। खुशी ने ये कहा, खुशी ने ये बोला। खुशी हमारी सबसे छोटी चचेरी बहन है। हमसे उम्र में ३० साल छोटी, लेकिन भाई-बहन का अनोखा रिश्ता हमेशा बना रहता है। गांव जाने पर तोहफे यानी चाकलेट के लिए जिद, शरारत मिश्रित हंसी के साथ स्वागत और शरारत से भरपूर उसकी जिंदगानी हमें उसके लिए और दो दिन रुकने के लिए मजबूर कर देती है। क्योंकि खुशी जैसी दूसरी हमारी कोई बहन नहीं। खुशी धीरे-धीरे बड़ी हो रही है। अब इस साल से उसने स्कूल भी जाना शुरू कर दिया है। खुशी आनेवाले सालों में ऐसी ही खुशी बनी रहे, यही दुआ है।


1 comment:

शरद कोकास said...

सलामत रहे यह खुशी औअर हम सबकी खुशियाँ

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

अमर उजाला में लेख..

अमर उजाला में लेख..

हमारे ब्लाग का जिक्र रविश जी की ब्लाग वार्ता में

क्या बात है हुजूर!

Blog Archive