Saturday, October 24, 2009

सर्वश्रेष्ठ होने की जंग कितनी सही?




आदमी सर्वश्रेष्ठ होने की जंग लड़ता रहता है। धीमे-धीमे। सर्वश्रेष्ठ यानी शिखर को छूने की तमन्ना। लेकिन मैं सर्वश्रेष्ठ होने की जंग में नहीं पड़ना त चाहता हूं। क्योंकि इस लड़ाई में सिर्फ नुकसान ही है। इतना तनाव लेकर हम क्या करेंगे। कुछ लोग सर्वश्रेष्ठ होने के लिए संघर्ष करते रहते हैं। क्रिटिकल होते हैं। आलोचनाओं में उनसे कोई नहीं सकता। आदमी रचनात्मकता के कामों में भी प्रतियोगिता करता है। प्रतिभागियों में गुण-दोष ढूंढ़ता है, लेकिन क्या ऐसा करना संभव है, हर समय। जब आप कोई सकारात्मक काम करते हैं, तो आपकी पूरी ऊर्जा उस काम को करने में लगती है। आपका प्रयास होता है कि वह काम बेहतर तरीके से हो जाये। मूर्तिकार जब मूर्ति बनाता है, तो ये नहीं सोचता कि उसकी मूर्ति दूसरे से बेहतर होगी। वहां श्रेष्ठता के लिए कोशिश होती है, जंग नहीं। जंग और कोशिश में फर्क सिर्फ इतना है कि जंग में खून बहता है और कोशिश में पसीना। मुझे कचोट तब होती है, जब देखता हूं कि रचनात्मकता यथा लेखन या अन्य किसी कामों में लोग प्वाइंट्स या नंबर देने लगते हैं। हम सकारात्मक प्रयास की माप कैसे कर सकते हैं। कैसे किसी रचना को आलोचना की दृष्टि से देख सकते हैं। सर्वश्रेष्ठ होने की जंग ने कई लोगों रुला दिया है। इस जंग में व्यावसायिकता की बू आने लगती है। इसमें लोग ये नहीं समझ पाते हैं कि जिस प्रयास को वे सिर्फ दूसरे से अच्छा करने के लिए कर रहे हैं, वह धीरे-धीरे नासूर बनता जा रहा है। फिल्म या अन्य चीजों की श्रेष्ठता के आधार पर वर्गीकरण करना मेरे बस की बात नहीं। क्योंकि मुझे हर प्रयास कुछ अलग नजर आता है। कुछ ऐसा, जो कि दूसरे में नहीं है। जैसे इस संसार में हर चेहरा अलग-अलग है। जिस दिन एक जैसे हो जाएंगे, हम भूलभुलैया में रहेंगे। हमारा देश कभी सर्वश्रेष्ठ होने की जंग में शामिल नहीं रहा। हमारे देश ने बेहतर होने के संघर्ष को आत्मसात किया है। ये एक संघर्ष है, जिसमें से कई वाद निकले। मेरे मन में ये विषयवस्तु कुछ दिनों से इसलिए घूम रहा था, क्योंकि आइआइटी जैसे संस्थानों में प्रवेश के लिए सर्वश्रेष्ठ होने का संघर्ष होता है। एक ऐसा संघर्ष जिसमें कुंठा का खुलेआम प्रदर्शन होता है। इसलिए सर्वश्रेष्ठ संस्थानों के बीच श्रेष्ठ संस्थान कम हैं। श्रेष्ठ और सर्वश्रेष्ठ होने की जंग में सिर्फ लकीर का फर्क है। जिंदगी कोई सौ मीटर की रेस तो है नहीं। न ही देश और समाज कोई खिलौना है। सर्वश्रेष्ठ होने के लिए कितने ही मनों को कुचल कर आपको ऊपर उठना पड़ता है, जबकि श्रेष्ठ होने के लिए कदमताल मिलाते हुए टीम वर्क के साथ आप आगे बढ़ते हैं। एक ग्रुप बनता है, जिसमें आपके समान श्रेष्ठ लोग होते हैं। वे आपकी जुबान बोलते और समझते हैं। आप भी उनकी सुनते हैं, क्योंकि वे आपकी सुनते हैं। कम्युनिकेशन के ये स्तर ही असल में विकास की सही अवधारणा है। और फर्क सिर्फ एक नजरिये का है। जैसे आधा भरा ग्लास या आधा खाली ग्लास।
लेखन में भी सर्वश्रेष्ठ होने की कवायद मेरी समझ से बाहर है। कोई लेखक कैसे सर्वश्रेष्ठ हो सकता है। विचारों का समुद्र कैसे श्रेष्ठता के पैमाने पर तौला जा सकता है। इस कवायद को समझने के लिए पूरा दशक चाहिए।



एक बात छोटी सी--


एक व्यक्ति को एक घोड़ा मिला। लोगों ने कहा-देखो कितना भाग्यशाली आदमी है। उसी आदमी को उस घोड़े ने बाद में पटक दिया, तो लोगों ने कहा कि ये आदमी कितना दुर्भाग्यशाली है कि इस घोड़े को ले आया। उस व्यक्ति के दोनों पैर टूट गए थे। उसी समय जंग छिड़ गयी। राजा युवाओं को सैनिक बना कर जंग में ले गया, लेकिन उस व्यक्ति को नहीं, क्योंकि उसके दोनों ही पैर टूटे हुए थे। बाद में लोगों ने फिर ने कहा कि देखो ये घोड़ा कितना सौभाग्यशाली है इसके लिए कि इसके कारण जान बच गयी।


यानी नजरिया हर हाल में अलग-अलग होता है। और जंग जारी रहती है समझने-समझाने की।

इसलिए श्रेष्ठ और सर्वश्रेष्ठ के पैमाने पर बहस या कवायद कितनी जरूरी है, जरा सोचिये 

7 comments:

M VERMA said...

बहुत सार्थक है आपकी यह चर्चा
बिडम्बना तो यह है कि श्रेष्ठ से इतर ही सर्वश्रेष्ठ की दौड मे आगे होता है.

अनिल कान्त : said...

यूँ की बात तो आपने बड़ी जोर की कही
भले ही गपशप के बहाने कही

श्रीकांत पाराशर said...

Aapki gup sup mein bhi gambheerta hai. jung aur koshish ko achhe se paribhasit kiya hai aapne. aapne nishchay hi ek achha mudda uthaya hai parantu sakaratmak soch ke saath is mudde ko samajhne wale, ya yon kahen ki is par gour karne wale kitne hain. bahar hal aap to likhte jayiye, chhodia dunia ko.

महफूज़ अली said...

bahut saarthak lagi yeh charcha....

संगीता पुरी said...

सबके सोंचने का ढंग अलग अलग होता है .. पर विभिन्‍न देश काल और परिस्थिति में अधिकांश लोग जिसे सर्वश्रेष्‍ठ कह दें .. वही सर्वश्रेष्‍ठ हैं भले ही वे हों या न हों !!

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा विचारणीय तथ्य!!

शरद कोकास said...

यह सर्वश्रेष्ठ क्या होता है भाई ?

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