Sunday, January 10, 2010

सैलून या कहें गुमटियां हैं सही जगह

मेरे लिये सैलून में बैठना कभी रोमांचकारी या दिलचस्प नहीं रहा। छुटपन में कुर्सी पर लकड़ी के पाये के सहारे ऐनक के सामने बैठा दिया जाता था,,क्योंकि ऊंचाई मार खाती थी। अब बड़े होते गए, तो वहां पर झट से, जब तक बाल काले थे, हेयर कटिंग करा कर आ जाते थे। लेकिन भगवान की दया से आधे बाल भरी जवानी में पक गए। तस्वीर देख सकते हैं। साइड में बाल पके हुए हैं। उसके बाद मित्रों के कहने पर बाल रंगवाना शुरू कर दिया। अब सैलून में टाइम ज्यादा देना पड़ता है। आंखें बंद किये गीले बाल का सूखने का इंतजार करते हुए। उस समय गुजरते वक्त का अहसास जेहन में नयी दुनिया रचता जाता है। कान तेज हो जाती है। सड़क पर गुजरते राहगीरों की बातें, फेरीवाले की आवाज और गाड़ी की आवाजाही कहीं ज्यादा स्पष्ट सुनाई देने लगती है। उसी सैलून में बगल में बैठे मित्र थ्री इडियट्स के बहाने पूरी एजुकेशन प्रणाली पर बहस भी करते मिल जाते हैं। हमने कहा कि भाई एजुकेशन सिस्टम बदलनी चाहिए, लेकिन विकल्प के रूप में नयी व्यवस्था अब तक क्यों नहीं बनी? अभी तक माध्यमिक स्तर पर ही पूरे देश में समान प्रणाली नहीं है। वहीं शिबू सरकार के रहने या नहीं रहने के मामले पर विवाद होते रहे। मैं एक बात दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी टीवी चैनल की बहसबाजी में जो जिस्ट या केंद्र बिंदु आप तलाशते रहते हैं, वह आप इन सैलूनों और गुमटियों में पाएंगे। अपनी औसत जिंदगी में हम कभी भी आसपास से गुजर रही चीजों और समय पर ध्यान नहीं देते। लेकिन सैलून में आंखें बंद कर वक्त काटने के दौरान, वही चीजें जेहन में घुसती चली जाती हैं और एक नयी कहानी रच जाती है। जिंदगी के कई रंग हैं। उन्हीं रंगों में से ये भी एक है। वहीं पर कोई चचा निकल जाते हैं, तो कोई भाई। इंसानी जज्बातों के टकराव भी देखने को मिलते हैं। अड्डेबाजी तो इसे नहीं कहेंगे, लेकिन इसमें एक तरह की परिपक्वता रहती है। क्योंकि कोई वर्गीकरण नहीं रहता। सिर्फ टाइम पास के लिए बातें होती हैं, बिना पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए। ऐसे में जो निष्कर्ष निकलते हैं, वे सही और सटीक होते हैं। वे बता जाते हैं कि समाज किस राह पर जा रहा है। सैलून या कहें गुमटियां हैं सही जगह खबरों के लिहाज से। अगर आपको आम पब्लिक का टेस्ट जानना हो तो। हाइप्रोफाइल का नहीं, जिन्हें सोसाइटी के निचले तबके से कोई मतलब नहीं।

3 comments:

अजय कुमार झा said...

बिल्कुल ठीक कहा आपने ,गुमटी चाहे बाल कटाने वाली हो या पान खाने वाली , असली खब्रर तो वहीं से निकलती है , विशुद्ध ब्लोगिया लेखन किया आपने आज , मजा आया

अजय कुमार झा

अनूप शुक्ल said...

सत्यवचन!

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

इस बार तो घर ही बुलाया था नाई। सैलून की बजाय घर में ज्यादा मस्त रहा संवाद। यह जरूर है कि पैसे दूने लगे!
कहें तो उसकी फोटू भी ठेल दूं ब्लॉग पर! :)

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