Saturday, January 9, 2010

कर्म का दर्शन

जिस दिन लोग भावनाओं को बांधनेवाली बातें करते हैं, उस दिन मन थोड़ा अखरता है। कहते हैं कि भावनाएं इंसान को कमजोर बनाती हैं। जो इंसान जितना ज्यादा भावुक होता है, उसके अपने मिशन में कामयाबी के कम से कम मौके रहते हैं। हमारा दिमाग हमेशा ये सोचता है कि महाभारत युद्ध के समय श्रीकृष्ण के मन में कैसी भावनाएं होंगी? भावनाओं के उस उच्च स्तर को कोई कैसे पा सकता है? ये जानते हुए भी कि मृत्यु ही अंतिम सच है और इसमें विनाश है, अर्जुन को गीता के रूप में दिया गया संदेश भावनाओं को रह-रह कर नया मार्ग दिखाता रहता है। कर्म करो, ईश्वर पर छोड़ दो, लेकिन मानव जात अपने स्वभाव या भावनात्मकता से नहीं जाता। वह रह-रह कर लौटकर उसकी डोर पकड़ कर लटक जाता है। कर्म तो करेंगे, लेकिन उसमें हमारी प्रेम, मोह और परिश्रम की भावना रहेगी ही। कैसे सिर्फ कर्म को कर्म मानकर छोड़ दिया जाए। कैसे परिणाम की अपेक्षा नहीं की जाए. किसी काम या पद के साथ-साथ रहते-रहते हम भी उससे बंधते चले जाते हैं। हम उसके साथ जीने-मरने लगते हैं। ये भावनात्मकता हमें लौटा लाती है। फिर वही सवाल, कैसे बिना भावना के कर्म को कर्म मानकर छोड़ें। गहरा अंतरद्वंद्व है। अंगरेजी के शब्द में प्रोफेशनल यानी व्यावसायिक माइंडसेट यानी मानसिकता का होना सफलता का सबसे बड़ा आधार है। ऐसे में ज्यादातर लोग आज-कल इसी शब्द का सहारा लेकर चोर दरवाजे से निकल जाते हैं। इसमें कर्म का विधान भी संपन्न हो जाता है। डिमांड भी पूरी हो जाती है और कर्म करने का संदेश भी हमसाया हो जाता है। कर्म करते जाना है....कमाते जाना है...। लेकिन ऐसा कर हम किसे धोखा देते हैं। बड़ा डीप फिलॉसफी है।?

1 comment:

निर्मला कपिला said...

कभी न कभी हर आदमी को ये अंतरद्वंद्व आन्दोलित अह्लादित करता है मगर त्रास्दी ये है कि आज की दुनिया मे उसे कहीं न कहीं और कभी न कभी इसे अनदेखा जरूर करना पडता है। फिर भी कर्म की निष्ठा मन के किसी कोने मे जाग्रित रहती है जीवन के किसी मोड पर वो रुकता जरूर है इस का अवलोकन करने के लिये। ये बहुदा लोगों के साथ होता है तभी तो कर्म की महानता वाला सूत्र अभी भी समाप्त नहीं हुया है । अच्छा आलेख है बधाई और शुभकामनायें

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