Sunday, April 4, 2010

सिर्फ शब्दों की जुगलबंदी से कब तक ताली बजवाने का सिलसिला चलता रहेगा...

मंत्री जयराम रमेश भोपाल में कन्वोकेशन के दौरान गाउन उतारते हुए उसे बर्बरता का प्रतीक मानते हैं। अंगरेजी राज, अंगरेजी शासन, गुलामी ये शब्द, ये बातें किसी को जागरूक नहीं करतीं। लगता है जैसे बेवकूफ बनाया जा रहा है। जिस शिक्षा प्रणाली को आज हमारा देश लागू किये हुए, वह भी बर्बरता का प्रतीक है। भारत के लोगों को मात्र बाबू बनाकर छोड़ दिये जानेवाले इस शिक्षा प्रणाली पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया जाता। जिस मैनेजरी की पढ़ाई के दौरान ये बातें कहीं गयीं, वहां भी तो नकल पश्चिमी सोच की ही है। जिस प्रबंधन की पढ़ाई आज की जाती है, वहां शायद सबसे अहम ये सिखाया जाता है कि कैसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जाये। यहां तक कि सरकार भी इसी सोच पर चल रही है। जनसरोकार से हटते संस्थान इस हद तक बेरुखे हो गये हैं कि कहीं नागरिक लाभ के लिए होनेवाले आंदोलनों के समय तनिक भी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती। परंपरागत भारतीय मानस या चिंतन को तो सरकार ने ही नकार कर रख दिया है। परंपरागत संस्थानें दम तोड़ रही हैं। संस्कृत भाषा को बचाने की कवायद कम देखने को मिल रही है। आज-कल जैसा चलन है, उसके हिसाब से आनेवाले दिनों में हमारे देश के शिक्षण संस्थानों पर भी गाज गिरनेवाली है। देश में हिन्दी पट्टी के विश्वविद्यालय मात्र डिग्री देनेवाले बनकर रह गये हैं। माध्यमिक और प्राइमरी स्तर पर शिक्षक के नाम पर दो-चार हजार पर शिक्षा मित्र और पारा शिक्षक की बहाली कर दी जा रही है। इनकी संख्या हजारों में है। समझ सकते हैं कि दो-चार हजार पानेवाले शिक्षक कितना मन लगाकर पढ़ायेंगे। बदलते दौर में देश में पहले से कायम सिस्टम का बंटाधार हो रहा है। वैसे में सिर्फ शब्दों की जुगलबंदी से कब तक ताली बजवाने का सिलसिला चलता रहेगा, पता नहीं। ये देश, ये समाज आज के दौर में किसी केंद्रीय मंत्री सिर्फ ये सुनने की इच्छा नहीं रखता है कि कौन किस विचारधारा का प्रतीक है, बल्कि समाधान के विचार या बिंदु मांगता है। ये तो बतकही या बहस शुरू करने के लिए अच्छा विषय हो सकता है, लेकिन इससे सरकार की कार्यप्रणाली पर बहस दम तोड़ती नजर आती है।

4 comments:

अजय कुमार झा said...

प्रभात जी ,
आपने बिल्कुल सही रग पकडी है इनकी आज यही हो रहा है कि असली मुद्दे से लोगों का ध्यान जानबूझ कर भटकाया जा रहा है । इसी घटना में जिस हिम्मत की तारीफ़ करके प्रशंसा के पुल बांधे जा रहे हं यदि इसके बदले वो तब होता जब कोई केंद्रीय मंत्री अपने बच्चे को किसी सरकारी स्कूल में दाखिला दिलवाता तब जरूर ही सब उनके लिए ताली बजाते

अजय कुमार झा

प्रवीण पाण्डेय said...

सिर्फ गाउन उतारने से काम नहीं चलेगा । आत्मा का उपचार होना चाहिये ।

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

ढपोरशंख.....नेता....
अच्छी प्रस्तुति.....विचारणीय पोस्ट....
http://laddoospeaks.blogspot.com/

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

देश को पिछले साठ सालों से ऐसे ही बेवकूफ बनाया जा रहा है. बस मदारी बदल जाते हैं..

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