Friday, April 30, 2010

भ्रष्टाचार एक कलंक है...

इस देश को क्या हो गया है पता नहीं। जो जहां है, ज्यादा कमाने के चक्कर में दुह रहा है। शर्म को बेचकर, अंतरात्मा को रौंदकर हर कोई ज्यादा कमाने की चाह रख रहा है। मेडिकल का क्षेत्र हो या कूटनीति का सब जगह इस कदर खुद से मुहब्बत का पागलपन सवार है कि देश को बेच दिया जा रहा है। सवाल ये है कि आखिर इस लालच का अंत कहां हैं? जिस आर्थिक विकास के नाम पर अंतर में व्याप्त चेतना का समूल नाश कर दिया जा रहा है, वहां से संस्कार नामके बीज के विकसित होने की प्रक्रिया खत्म होती जा रही है। क्यों माधुरी गुप्ता महज प्रेम या पैसे के लिए देश को गिरवी रख देती है। क्यों इंडियन मेडिकल काउंसिल का एक नामचीन सदस्य करोड़ों रुपए रिश्वत लेने का आरोपी पाया जाता है। जिस गांधी को मजाक बनाते हैं। जिस गांधीवाद को आप बेकार, बववास कहते हैं, उस गांधीवाद के माध्यम से कम से कम संस्कार के बीज जरूर बोये जाते रहे हैं। लेकिन आज गांधी के विचारों को तिलांजलि देकर जैसे-तैसे पैसे कमाने को महत्व दिया जा रहा है। सवाल ये है कि इस चीज की शुरुआत कहां से होती है? खुद के ईमान से भटक जाने का भय क्यों नहीं सताता है? सबके मन में एक पहरेदार जरूर है, जो ये सवाल करता है कि आप इस रास्ते पर क्यों जा रहे हैं? लेकिन चोर भाई कहता है-अरे यार एक बार डुबकी लगा लो, कौन देखता है। इसी चोर भाई के लगातार दबाव के चलते मन भी चलता है यार, वाली तर्ज पर काम करना शुरू कर देता है। आखिर लोगों की अंतरात्मा में खुद या देश के प्रति इज्जत क्यों खत्म होती जा रही है। चाहे ललित मोदी हो या कोड़ा, हर कोई नयी कहानी की इबारत लिख रहा है। ऐसे में नक्सलवाद न पनपे, तो क्या पनपे। ऐसे में हमारी चिकित्सा व्यवस्था न ढहे, तो क्या ढहे और ऐसे में हमारी सुरक्षा व्यवस्था तार-तार न हो जाये, तो क्यों न हो। गौर करनेवाली बात ये है कि सारे लोग पावरवाले पोजिशन पर हैं। आखिर सरकार में पद पाकर कोई क्यों इतना देश या समाज के प्रति निरंकुश हो जाता है। भ्रष्टाचार एक कलंक है। अब ये कलंक का टीका थोड़ा ज्यादा ही गहरा होता जा रहा है। डर लगता है कि यदि बुनियाद इस कदर कमजोर होती चली जाएगी, तो आनेवाली पीढ़ियों को कैसा देश या समाज मिलेगा।

6 comments:

honesty project democracy said...

जिस देश में निगरानी ,जाँच,कार्यवाही और दोषियों पे न्यायसंगत सजा का प्रावधान की व्यवस्था, पूरी तरह सड़ चुकी हो ,वहाँ अब सिर्फ इमानदार लोगों को देश भर से चुनकर और एकजुट कर , हर सरकारी खर्चों और घोटालों की जाँच में लगाकर ही , इस देश और समाज को बचाया जा सकता है / अच्छी वैचारिक रचना के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद /आशा है आप इसी तरह ब्लॉग की सार्थकता को बढ़ाने का काम आगे भी ,अपनी अच्छी सोच के साथ करते रहेंगे / ब्लॉग हम सब के सार्थक सोच और ईमानदारी भरे प्रयास से ही एक सशक्त सामानांतर मिडिया के रूप में स्थापित हो सकता है और इस देश को भ्रष्ट और लूटेरों से बचा सकता है /आशा है आप अपनी ओर से इसके लिए हर संभव प्रयास जरूर करेंगे /हम आपको अपने इस पोस्ट http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html पर देश हित में १०० शब्दों में अपने बहुमूल्य विचार और सुझाव रखने के लिए आमंत्रित करते हैं / उम्दा विचारों को हमने सम्मानित करने की व्यवस्था भी कर रखा है / पिछले हफ्ते अजित गुप्ता जी उम्दा विचारों के लिए सम्मानित की गयी हैं /

दिलीप said...

bahut achcha lekh....kafi kuch jaanne ko mila...

प्रवीण पाण्डेय said...

देख तेरे इस देश की हालत क्या हो गयी भगवान,
कितना बदल गया इन्सान ।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

भ्रष्ट राजनीतिबाज और अफसर इस देश को गृहयुद्ध की ओर ढकेल रहे हैं.

Udan Tashtari said...

कौन जाने कैसे इस कलंक से निजात मिलेगी या मिलेगी भी कि नहीं.

Dr. Purushottam Lal Meena Editor PRESSPALIKA said...

खुद्दार एवं देशभक्त लोगों का स्वागत है!
सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले हर व्यक्ति का स्वागत और सम्मान करना प्रत्येक भारतीय नागरिक का नैतिक कर्त्तव्य है। इसलिये हम प्रत्येक सृजनात्कम कार्य करने वाले के प्रशंसक एवं समर्थक हैं, खोखले आदर्श कागजी या अन्तरजाल के घोडे दौडाने से न तो मंजिल मिलती हैं और न बदलाव लाया जा सकता है। बदलाव के लिये नाइंसाफी के खिलाफ संघर्ष ही एक मात्र रास्ता है।

अतः समाज सेवा या जागरूकता या किसी भी क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों को जानना बेहद जरूरी है कि इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम होता जा है। सरकार द्वारा जनता से टेक्स वूसला जाता है, देश का विकास एवं समाज का उत्थान करने के साथ-साथ जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों द्वारा इस देश को और देश के लोकतन्त्र को हर तरह से पंगु बना दिया है।

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, व्यवहार में लोक स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को भ्रष्टाचार के जरिये डकारना और जनता पर अत्याचार करना प्रशासन ने अपना कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं। ऐसे में, मैं प्रत्येक बुद्धिजीवी, संवेदनशील, सृजनशील, खुद्दार, देशभक्त और देश तथा अपने एवं भावी पीढियों के वर्तमान व भविष्य के प्रति संजीदा व्यक्ति से पूछना चाहता हूँ कि केवल दिखावटी बातें करके और अच्छी-अच्छी बातें लिखकर क्या हम हमारे मकसद में कामयाब हो सकते हैं? हमें समझना होगा कि आज देश में तानाशाही, जासूसी, नक्सलवाद, लूट, आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका एक बडा कारण है, भारतीय प्रशासनिक सेवा के भ्रष्ट अफसरों के हाथ देश की सत्ता का होना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-"भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान" (बास)- के सत्रह राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से मैं दूसरा सवाल आपके समक्ष यह भी प्रस्तुत कर रहा हूँ कि-सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! क्या हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवक से लोक स्वामी बन बैठे अफसरों) को यों हीं सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति इस संगठन से जुडना चाहे उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्त करने के लिये निम्न पते पर लिखें या फोन पर बात करें :
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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