Sunday, June 13, 2010

मानसिकता ही दोयम दर्जे की हो चुकी है.

पहले जब फौज में जाने की बात होती थी, तो लोग सबकुछ भूल उसे करियर के रूप में अपनाने की सलाह देते थे. लेकिन आजकल ऐसा नहीं. फौज को लेकर क्रेज लगातार घट रहा. आइएमए, देहरादून से पासआउट कैडेट्स में झारखंड के मात्र आठ कैडेट्स थे. झारखंड जैसे स्टेट से यूथ फौज में नहीं जाना चाह रहे. ये इस स्टेट का मानसिक पिछड़ापन है या सुविधाभोगी जिंदगी की अंतहीन चाह. सामाजिक मर्यादाओं में हो रहे बदलावों ने एक अलग तरह की टेंडेंसी पैदा की है. जो हमारे सामाजिक सरोकारों से साफ तौर पर जुड़े हैं. जब फेसबुक पर लोग नक्सलवाद का समर्थन करते हुए एक अनजानी संघर्षशील रूमानी दुनिया का समर्थन करते हैं, तो लगता है कि पहले हमें खुद को जीतने के लिए पहल करनी होगी. बेशक एमबीए, एमसीए या इंजीनियरिंग के फील्ड सुरक्षित या सेक्योर फ्यूचर तैयार करते हैं, लेकिन मिलिट्री जैसी सेवा में बेहतर लोगों के नहीं जाने की कमी जरूर खलेगी. खबर थी कि पंजाब जैसे राज्य से सेना में भागीदारी ४० फीसदी तक कमी हुई है. ये वहां की बदलती लाइफस्टाइल की वजह से है. आज हमारी लाइफस्टाइल सिर्फ ड्राइंगरूम तक सिमट कर रह गयी है. हमारे पास जानकारियों का भंडार है, लेकिन हम उनका व्यक्तिगत जीवन में अपनी बेहतरी के लिए उपयोग नहीं कर रहे. इस समय एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है, जो सुविधाभोगी होने के साथ देह का कष्ट उठाने के लिए तैयार नहीं है. इसमें इस पीढ़ी का क्या दोष, जबकि पुरानी पीढ़ी की मानसिकता ही दोयम दर्जे की हो चुकी है. नयी पीढ़ी तो उसी विरासत को आगे बढ़ाने का काम करेगी. स्थिति चिंताजनक है.

5 comments:

Anonymous said...

क्रेज -------> जूनून
पासआउट कैडेट्स -----> आइएमए, देहरादून से प्रशिक्षित हुए अफसरों
स्टेट से यूथ -------> राज्य से युवा
टेंडेंसी -------> प्रवृत्ति
या इंजीनियरिंग के फील्ड ------> या इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र
सेक्योर फ्यूचर ------> सुरक्षित भविष्य
मिलिट्री -----> सेना
लाइफस्टाइल ------> जीवनशैली


हिंदी इतनी भी कठिन नहीं है की जबरन अंग्रेजी के शब्द ठूंसे बिना किसी के पल्ले ही न पड़े.

veeru said...

आप को २ वाकये सुनाता हूँ जो मेरे सामने घटित हुए है
१ बात राजधानी दिल्ली की है करीब २ साल पहले दिल्ली के बिजली विभाग के दफ्तर में मै बिल जमा कराने गया था वहा पर बहुत लंबी लाइन लगी थे १ बुजुर्ग भी लाइन में थे वो काफी बुजुर्ग थे व दोपहर की कड़ी धुप में लाइन में खड़े नहीं हो पा रहे थे तो उन्होंने आगे वाले लड़के से कहा की बेटा में एक्स सर्विसमेन(रिटार्यड) हूँ किरपा करके मेरा बिजली का बिल भी जमा कर दो तो उस लड़के ने तपाक से कहा की मै क्या करू ?? मुझसे पुछ के गया था फौज में जो मेरे से कह रहा है व् उनसे बत्तमीजी से बात करने लगा
१ आदमी जिसने अपनी सारी जिन्दगी देश सेवा में लगा दी उससे हमारे देश के युवा कहते है कि मुझसे पुछ के गया था फौज में ??


२ बात तब की है जब कारगिल युद्ध चल रहा था जालन्धर के पास सेना के जवानो का ट्रक लड़ाई में जा रहा था रात को १ ढाबे में वो खाना खाने के लिए रुके उन्होंने(जवानो )ने खाना खाया व् चूंकि वो संख्या में ज्यादा थे व उनके पास नकद पैसे कम पड गये तो उन्होंने ढाबा मालिक से कहा कि अभी हमारी टुकड़ी के दूसरे जावन यही से गुजरंगे तो आप को आप का बकाया पैसा वो दे देंगे कोई २५० रूपये कम पड गये थे वो ढाबा मालिक जो सरदार था उनसे लड़ने लगा व् उन्हें भद्दी गाली देने लगा व् उन में जोरदार बहस हो गयी (मै भी वहीँ था व मेरे साथ मेरे २ दोस्त भी थे हम शिमला से किसी काम से लौट रहे थे )
ये देख कर हमें इतना गुस्सा आया कि क्या कहूँ फिर हमने ढाबे वालो को पैसे दिए फौजी भाई हमें मना कर रहे थे पर हम नहीं माने ये ढाबे वाला जो दिन के १० हज़ार रूपये कमाता है वो २५० रूपये के लिए मर रहा था (अभी अगर दुश्मन सेना ने यहाँ पे कब्ज़ा कर लिया तो इसे ये ढाबा छोड़ के भागना पड़ेगा ) और १ तरफ वो जवान है जो अपनी जान हथेली पर रख कर रणभूमि में युद्ध के लिए जा रहे थे आप सोचिये उन जवानो के दिल में क्या गुजर रही होगी ??
अब आप बताईये कोई क्यूँ करेगा सेना ज्वाइन ??
वीर बनाए नहीं जाते वीर तो पैदा होते है

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

प्रभात जी, कितने लोग कहां से बैठे इन आंकड़ों को भी देखियेगा... सेना में बैठे लोगों ने एकाधिकार बना रखा है इस पर... बेरोजगारी के इस दौर में सिपाही बनने के लिए मारामारी हो जाती है, अफसर नहीं मिलते! कमाल है... बात यह है कि सैनिक पृष्ठभूमि वाले लोग कम आ रहे हैं और गैर सैनिक पृष्ठभूमि वालों को लिया नहीं जाता...

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट ! बहुत बहुत बधाइयाँ,शुभकामनाएं|

Udan Tashtari said...

सेना में भर्ती की तरफ रुझान कम हुआ है, यह तो तय है.

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