Tuesday, June 29, 2010

जिस समाज में नयी सोच का उभरना खत्म हो जाता है, वो मरने लगता है

जिस दिन जिस समाज में नयी सोच का उभरना खत्म हो जाता है, उस दिन वो समाज मरने लगता है. हमारे समाज में नयी सोच का पनपना खत्म हो चुका है. नये वाद पैदा नहीं हो रहे और जो हैं, वे पुरातन वादों के सहारे लठिया टेकते हुए आगे बढ़ रहे हैं. जिस दिन रावण फिल्म की कहानी पढ़ी-देखी नहीं, राजनीति फिल्म की कहानी पढ़ी- देखी नहीं, तो ये लगा कि हमारे फिल्मकार फिर से पुरानी कहानियों के धरातल पर अपनी क्रिएटिविटी की नींव खड़ी कर रहे हैं. रेड अलर्ट नामक फिल्म भी आ रही है, नक्सलवाद के बहाने.

जहां तक मैं समझता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री में कल्पना को नए सिरे से परिभाषित करने की अपार क्षमता होती है, लेकिन हमारे फिल्मकार इस कम्पीटिशन के माहौल में खुद को ढालने के लिए पुरानी शराब को ही नयी बोतल में डाल कर पिलाने की कोशिश कर रहे हैं. जब पश्चिम से तुलना करते हैं, तो अपने फिल्मकारों की कल्पना को एक ऐसे पैमाने पर पाते हैं, जहां नकल की आंधी तो चल निकली है, लेकिन खुद के बल पर इमारत खड़ा करने की कोई कोशिश नहीं होती.

 प्रेम कहानियों और मां-बेटे, भाई-बहन के रिश्ते पर तीन दशक किसी तरह से गुजर तो गए, लेकिन जब सोसाइटी में आंधी की तरह बदलाव हो रहे हों, तो सिर्फ फैशन इंडस्ट्री की निगाह से पूरे शहरी जीवन को देखने का सिर्फ प्रयासभर होता है. शहरी जीवन में न्यूक्लियर फैमिली भी है. बिखरते रिश्ते हैं और मरते मन के साथ लाखों लोग हैं. उनके अंदर झांकने का प्रभावशाली नजरिया हमारे फिल्मकारों के पास नहीं है. वे फिल्म बनाते हैं, तो सिर्फ अतिवादी नजरिया दिखता है, जैसे विदेशी डायरेक्टर द्वारा बनाए गए स्लमडॉग मिलेनियर को ही लें. बीच का जो आबादी का हिस्सा है, उसकी जीवनशैली को छूने की हिम्मत किसी में नहीं है.

बाजार का इस कदर हावी होना हमें कचोटता है. मेरा मानना है कि मिडिल क्लास की समस्याओं को छूने की हिम्मत जिस दिन फिल्मकार करने लगेंगे और कल्पना से परे फिल्मों का निर्माण करने लगेंगे, उस दिन नई सोच को पैदा करने की उनकी हुनर सबको चकित कर जाएगी या रुला जाएगी. इतिहास को आईने में रखकर कितने दिनों तक मूर्ख बनाने की प्रक्रिया जारी रहेगी. जरूरी है कि इतिहास से कोई छेड़छाड़ न की जाए, क्योंकि उसे पुनः परिभाषित करने की कोशिश बेकार ही होगी. जिंदगी में आगे बढ़ना ही सच्ची पहल है. कब्र खोदने से कंकाल के सिवाय कुछ नसीब नहीं होनेवाला है.

सोच को मरने मत दीजिए. क्योंकि ये सोच ही आपकी अगली पीढ़ी में आपके लिए इज्जत पैदा करेगी.

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जिस दिन जिस समाज में नयी सोच का उभरना खत्म हो जाता है, उस दिन वो समाज मरने लगता है
बिल्कुल सत्य कथन है, व्यक्तियों और सभ्यताओं पर भी लागू होता है ।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

क्या हम लोग वास्तव में जीवित हैं? और इन्सान कहलाने काबिल हैं...

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