Sunday, August 1, 2010

सच्चा दोस्त, आज तक सामने नहीं आया.

मैं जिंदगी की हजारों बंदिशों को तोड़ देना चाहता हूं. मैं दूसरों का दर्द समेट लेना चाहता हूं. किसी के अंदर की आग से खुद को जला लेना चाहता हूं. लेकिन वह दूसरा कोई, जो दोस्त कहलाता है, सच्चा दोस्त, आज तक सामने नहीं आया. फेसबुक पर सात सौ दोस्तों की सूची में सही मायने में कहें, तो कोई ऐसा नहीं लगता, जो अंतिम समय में कंधा देने आये. क्या ये मेरे अंदर की गलत भावना है या कुछ और है. जो सच है, वह सच है. आज कल हम किसी के मित्र होने का केवल ढोंग करते हैं. हम किसी के मन से सच्चे मित्र नहीं होते. हमारे पास खुद के अलावा दूसरे किसी मित्र की दुखी कहानी को सुनने का वक्त नहीं है. हम किसी के अपने अंदर की तकलीफ को साझा नहीं करते. आज भले ही रिश्तों की गरीबी के बीच फ्रेडशिप के बहाने बाजार हावी होने की चेष्टा कर रहा हो, लेकिन ये हमारे बीच के रिश्तों के खत्म होने की कहानी है. हमने अपने रिश्ते खुद मिटा दिए.फ्रे़डशिप डे पर फेसबुक पर एक स्टेटस पढ़ा..

When we honestly ask ourselves which person in our lives mean the most to us, we often find that it is those who, instead of giving advice, solutions, or cures, have chosen rather to share our pain and touch our wounds with a warm and tender hand. The friend who can be silent with us in a moment of despair or confusion, who can stay with us in an hour of grief and bereavement, who can tolerate not knowing, not curing, not healing and face with us the reality of our powerlessness, that is a friend who cares. Wish You Happy friendship day


   जब कोई दूसरा मेरे सुख-दुख का साथी नहीं बन सकता, तो मैं आंखें बंद कर किसका ख्याल करके अपनी तकलीफें साझा करूं. थोड़ा दार्शनिक हो जाता हूं, तो सोचता हूं कि सिवाय ईश्वर के मेरा कौन सा मित्र है. उस अंतिम शक्ति को ही मैं अपना सारा भार देकर अपनी शांति को उधारी में ले लाता हूं. जिंदगी की तेज गति में मेरे लिये सिवाय ईश्वर के साथ के और कुछ नजर नहीं आता. आज तक मुझे सच्चे दोस्त की तलाश जारी है.

सच में कहूं तो  मैं खुद भी अपने स्वार्थ में इतना अंधा बन चुका हूं कि किसी के दुख में सहभागी नहीं बन पाता. मेरा मन इसके लिए मुझे लगातार धिक्कारता है. कभी कृष्ण-सुदामा की मित्रता के किस्से सुनकर मन आह्लादित हो जाता था. सोचता था कि कृष्ण जैसा सच्चा दोस्त मुझ गरीब को भी मिल जाए, लेकिन आज तक नहीं मिला. जब भी वह सच्चा दोस्त मिलेगा, तो मैं उसे अपनी सारी तकलीफें बताऊंगा. अपनी जिंदगी की हर कहानी साझा करूंगा. लेकिन वह सच्चा दोस्त, जो मेरी तकलीफों को समझे, सुने, आज तक नहीं मिला.

मैंने भी सच्चे मित्र होने की कोशिश जरूर की, लेकिन ये जालिम दुनिया बनने नहीं देती. अगर उदार होता हूं, तो कहती है सीधा है. अगर थोड़ा टेढ़ा, तो कहती है घमंडी है. थोड़ा पैसा बचाता हूं, तो कहती है कि कंजूस है. खर्च करता हूं, तो कहती है कि खर्चीला हूं. मैं मैं नहीं रहता. मैं सच्चे होने के चक्कर में खुद से भागने लगता हूं. मैं न तो सुदामा बन पाया और न कृष्ण. मैं खुद सच्चा दोस्त नहीं बन पाया. लेकिन थोड़ा स्वार्थी होकर कहूं, तो मुझे सच्चे दोस्त की तलाश है. ऐसे में अब अंतिम शक्ति ईश्वर ही मुझे मेरे सच्चे दोस्त से मिलवायेगा.

4 comments:

मो सम कौन ? said...

मिलेगा सरकार, सच्चा दोस्त आपको भी मिलेगा। और जितना देर से मिलेगा, उतना ही बेहतर मिलेगा।
बाउम्मीद रहिये, शुभकामनायें।

Udan Tashtari said...

चिन्ता न करें..सबको मिलता है!

प्रवीण पाण्डेय said...

आपके आत्मावलोकन में सबको कुछ न कुछ अपनापन दिखता है।

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं!
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

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