Wednesday, September 8, 2010

मीडिया और इनसिक्योरिटी

आज-कल हर कोई इनसेक्योर फील कर रहा है. खासकर मीडिया में लोग अजीब सी ग्रंथी लिये जीते रहते हैं. नौकरी रहेगी या नहीं रहेगी. हम परिवर्तन के हिसाब से रह पाएंगे या नहीं, बहुत कुछ. जो जहां है, वहीं बेचैन है. आखिर ऐसा क्यों है, ये जानने के लिए कई एक्सपर्ट आए और चले गए. वैसे जहां बेचैनी है, वहीं आगे बढ़ने के तरीके भी बनते हैं. कोई काम कैसे नए आइडिया के साथ किया जाए. ये चुनौती हमेशा बनी रहती है.

हमारे जेहन में हमेशा एक ख्वाब रहता है. खासकर हरेक मीडिया पर्सन के मन में पावर यानी सत्ता के आसापास घूमते रहने का ख्वाब जरूर रहता है. और यहीं से सारी गड़बड़ी शुरू हो जाती है. काफी सारे मीडियाकर्मी सारी काबिलियत रहते हुए वे चीजें हासिल नहीं कर पाते, जो वे कर सकते हैं. शायद हम भी उसमें से एक हों. हर मीडिया कर्मी के पास शुरुआती दौर में शायद समाज बदलने का जज्बा होता है, जो बाद में नौकरी बचाने में तब्दील हो जाता है. इसी नौकरी बचाने की कशमकश से एक नई जिद किसी तरह भी सत्ता के पास बने रहने की होती है, चाहे वह कैसी भी हो.

सवाल वही है कि जो मीडिया पर्सन है, वह क्या सही मायने में मीडिया का आदमी या पत्रकार रह जाता है. या फिर वह उन चंद लोगों में शुमार हो जाता है, जो पैसे या लाभ के लिए कुछ भी कर सकता है. हमारे हिसाब से वह उन चंद लोगों में शामिल हो जाता है, जो लाभ के लिए कुछ भी कर सकते हैं. इसी कारण भारतीय मीडिया के पास वह हाइयेस्ट टच प्वाइंट नैतिकता के हिसाब से आज तक नहीं उभर कर आया है, जिसके सहारे हमारे देश की मीडिया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उदाहरण बने.

इलेक्ट्रानिक मीडिया के दनादन काल में न तो खबर की ही अहमियत बच रही है, ना ही किसी खबर की गहराई तक हम जा पा रहे हैं. किसी खास चैनल के सिर्फ बेहतर करने से भी पत्रकारिता का परिदृश्य बदलने नहीं जा रहा है. ऐसे में हम जब टोटैलिटी में पूरी बात करते हैं, तो हम शर्मिंदा होते हैं. हमारी मीडिया पर ही मुंबई हादसे के बाद गैर-जिम्मेवार होने के आरोप लगते हैं. तब जब सरकार इसे कंट्रोल करने की बात करती है, तो हम विरोध पर उतारू हो जाते हैं.

 गला काट प्रतियोगिता के दौर में जब खुद को जिंदा रहने की बात आ जा रही है, तो हमारी मीडिया भी वही कर रही है, जो जंगल में जानवर करता है. लेकिन हम चौथे स्तंभ का दावा करनेवाले इन सब चीजों से ऊपर कब उठेंगे, ये पहला सवाल है. मीडिया कब जिम्मेवार बनेगी और इसमें काम करनेवाले कब इनसिक्योरिटी के स्तर को खत्म कर पाएंगे, ये सोचने की बात है. ये इनसिक्योरिटी पैदा करनेवाला भी पत्रकारिता समूह ही है, जो सबसे ज्यादा गुटबाजी का शिकार है. कारपोरेट शैली की बात करते-करते वही निम्न स्तर की गुटबाजी की बात शुरू हो जाती है. समय आ गया है कि दूसरों को उपदेश देनेवाले मीडिया के लोग खुद के अंदर भी झांकें.

4 comments:

विनीत कुमार said...

ये इनसिक्योरिटी पैदा करनेवाला भी पत्रकारिता समूह ही है, जो सबसे ज्यादा गुटबाजी का शिकार है. कारपोरेट शैली की बात करते-करते वही निम्न स्तर की गुटबाजी की बात शुरू हो जाती है.
आपने बहुत ही कम शब्दों में मीडिया के भीतर के सच को हमारे सामने लाकर रख दिया है। आपकी एिस पोस्ट से बहुत प्रभावी हूं,पढ़ता तो लगभग सारी पोस्टें ही..

प्रवीण पाण्डेय said...

जो सिद्धान्त व्यक्ति और समाज पर लागू होता है, उसकी परिधि में मीडिया भी है।

Anonymous said...

English me phir bhi professional log hain. Hindi me mahaul dino-din Ghatiya hota ja raha. Chand paise ki khatir hum kisi bhi had tak jaa sakte hain. Ranchi ke patrakaron ne to ise aur bakhoobi saabit kiya hai. Itihas me darz hoga.

Besi gambhir lekahan ke chhakaar me ahan kiya paid jaai chhi. Blog ke naam ke ta sarthakta rakhiyo. Baaki sab thike chhai prabhat babu.

prabhat gopal said...

एनोनिमस सर.. .आपने पहले तो एनोनिमस बनकर कमेंट किया है. साथ ही सीधे तौर पर किसी खास जगह के पत्रकारों पर उंगली उठा रहे हैं. अगर आपमें इतनी ही हिम्मत है, तो नामके साथ कमेंट करें. जहां तक ब्लाग के नाम की सार्थकता की बात है, तो गपशप में वे सारी चीजें शामिल होती हैं, जो गंभीर हों या हास्य लिये हो. ये समझ से परे है कि आपने गपशप को सिर्फ बतकही या हल्की बातों का मंच ही क्यों समझ लिया है. पहले तो कमेंट्स करने में परिपक्वता का परिचय दें और तर्क के साथ बात रखें. नहीं तो कमेंट ना करें. मॉडरेशन में मैंने आपके कमेंट को न चाहते हुए भी इसलिए पब्लिश किया कि दुनिया जाने कि आपने क्या लिखा है और हमने क्या जवाब दिया है.

शुक्रिया..

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