Tuesday, October 5, 2010

बावर्ची फिल्म का राजेश खन्ना लाइफ में मांगता

आज  हर व्यक्ति का घर अलग है. हर भाषा के लिहाज से अपना राज्य है यानी बंटवारे के लिहाज से पूरा देश बंटा है. ऐसे में एक फिल्म बावर्ची की याद हो आती है. राजेश खन्ना अभिनीत बावर्ची किरदार हमेशा गुदगुदाते रहता है. जिंदगी की दौड़ में इतना दबाव और खींचतान है कि लगता है, हमारे बीच भी वैसा एक बावर्ची आए, जिसके पास हमारी हर समस्या का हल हो. अगर आपमें से किसी ने उस फिल्म को ना देखा, हो तो देख लें.
हम खुद से परेशान रहते हैं. हमारी आत्मा परेशान रहती है. फेसबुक पर दूसरों के बेहतर स्टेटस देखकर परेशान रहते हैं. अनाप-शनाप बकना जारी रहता है. ऐसे में एक बावर्ची फिल्म के राजेश खन्ना टाइप किरदार की डिमांड काफी बनती दिख रही है. एक ऐसा व्यक्ति आए, जो मस्तमौला तरीके से हरेक को उसके अपने अंदर झांकने को विवश कर दे. कुछ ऐसा कर दे कि जादू हो जाए. जादू हमारी जिंदगी में.

मैं खुद कई लोगों से मिलता हूं. हर किसी को जल्दी रहती है. जल्दी काम निपटाने की. उस काम को निपटाने की जल्दी इसलिए कि उससे पैसे आएंगे. कोई जिंदगी जीने की बात नहीं करता है. कोई आदमी मुझे ये नहीं कहता कि आओ मेरी मोटरसाइकिल के पीछे बैठो, मैं तुम्हें एक लंबी सैर करा कर लाता हूं. मुझे किसी के मेरे अपने होने के अहसास की छुअन लिये काफी साल गुजर चुके हैं. स्कूल टाइम में किसी की साइकिल के आगे बैठ मेन रोड के चक्कर लगाना याद आ जाता है. उसी के साथ याद आ जाता है, किसी खास दोस्त के साथ सिनेमा देखने के लिए साइकिल चलाकर जाना. आज ३६ साल की उम्र में मेरे किसी मित्र के लिए या मुझे भी ऐसा कुछ करने के लिए समय नहीं है.

 वैसे में कोई बावर्ची फिल्म का राजेश खन्ना अगर कम से कम मेरी जिंदगी में आ जाए और मेरे आसपास की दुनिया में रंगीनियत घोल दे, तो मस्त हो जाऊं. मैं कोई उपदेशक नहीं चाहता और न कोई नीति बतानेवाला. बस मुझे मेरे आसपास की दुनिया को बदल डालनेवाले चाहिए.

मस्ती, शब्द जेहन में आते ही जैसे व्यक्ति का रूप उभरता है, वैसा व्यक्ति मुझे मेरी जिंदगी में चाहिए. रोजमर्रा की झिकझिक तो चलती रहेगी, लेकिन इस झिकझिक में कोई ऐसा आ जाए, जो इसी झिकझिक को चैलेंज बताकर उसे निपटाने को कहे, तो बात बन जाये. तब हम भी मैनेजमेंट गुरु कहलाएं. यहां तो अम्मा यार, इतना लोड है, कह कर टेंशन दे डालने की आदत है. ऐसे में बावर्ची फिल्म का राजेश खन्ना आकर ये कहें कि ये सामने वाला काम ऐसे और इतनी आसानी से हो जाएगा, तो मजा आ जाए.

ये मंदिर-मस्जिद का झगड़ा, ये कामनवेल्थ का लफड़ा, सारा कुछ चट से सुलझ जाए. सामने मंदिर का घंटा बजे, तो बगल में मस्जिद में अजान हो. बस बावर्ची फिल्म के राजेश खन्ना सीधे परदे से हमारी जिंदगी में आ जाएं. जब गुस्सा आए, तो गुदगुदाए. जब टेंशन हो, तो हंसाए. तब हम भी गाएं-मेरी जिंदगी में आए हो तुम बहार बनके.

ये जिंदगी नियामत है. उपहार है. हम उसके माध्यम से जान पाएंगे. हमारी जिंदगी के स्याह पन्नों में रंगीनियत की बौछारें होंगी. खाना भी खिलाये, तो कुछ हमारा मजाक भी उड़ाये. जानता हूं कि असल जिंदगी में ऐसा किरदार नहीं मिलता. नहीं संभव हो पाता. लेकिन अगर कहीं मिल जाए, तो जरूर हमारे पास भी भेजिएगा.

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जीवन संभवतः ऐसी ही उन्मुक्तता को कहते हैं।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

वाकई.

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
There was an error in this gadget
There was an error in this gadget

अमर उजाला में लेख..

अमर उजाला में लेख..

हमारे ब्लाग का जिक्र रविश जी की ब्लाग वार्ता में

क्या बात है हुजूर!

Blog Archive