Wednesday, August 20, 2008

हमारी जिद और उनका जीवन

आज मीडिया क्रांति और खुलेपन के इस दौर में हम और आप खुश हैं। हम ड्राइंग रूम में बैठ डिस्कशन करते हैं। खुद के प्रगतिशील का होने का दंभ लिये आत्ममुग्ध हैं। लेकिन जो सच्चाई है, वह कड़वी है। उसे हम स्वीकार भी नहीं करना चाहते हैं। २० अगस्त को अखबार में जादूगोड़ा डेटलाइन से एक खबर छपी। खबर में आरती-पुरुषोत्तम का जिक्र है। हुआ यूं कि चार दिन पहले गुराॆ नदी में डूबे पुरुषोत्तम सरदार का शव सोमवार को तैरता मिला। उसकी पत्नी आरती के ऊपर गमों का पहाड़ टूट पड़ा। ये दोनों प्रेम विवाह करने के कारण पिछले एक दशक से सामाजिक प्रताड़ना झेल रहे थे। पुरुषोत्तम की मौत के बाद भी उसे कंधा देने के लिए कोई आगे नहीं आया। नदी से भी लाश आरती ने खुद अपने तीन बच्चों की सहायता से निकाली। अंतिम संस्कार के लिए जब कोई मदद नहीं मिली, तो नदी किनारे ही आरती ने कब्र खोदी और अपने आंचल को फाड़ कर पति का कफन बनाया। और अंतिम विदाई दी। यहां आज इस घटना का उल्लेख करना जरूरी हो गया। कम से कम उन लोगों के लिए, जो कंप्यूटर और टीवी के सामने पांच घंटे गुजारते हैं, लेकिन व्यक्तिगत जीवन के अतिरिक्त समाज के खास हिस्से में घटना रही घटनाओं से अनजान हैं। हम सोकॉल्ड मॉडनॆ लोग इस सच्चाई से अनजान हैं कि आज भी सोसाइटी का खास हिस्सा सदियों पुरानी विचारधारा को त्याग नहीं पाया है। वह बंधनों को मनवाने के लिए इतना कठोर हो गया है कि मौत के बाद भी उसका दिल नहीं पसीजता है। जब एजुकेशन और संस्कार की बात हम करते हैं, तो सिफॆ पूजा-पाठ और मंदिरों की ही बात होती है। दूसरी ओर जब हम अपनी गलत सामाजिक विचारधारा को टूटते देखते हैं, तो चुप हो जाते हैं। ऐसा कब तक चलेगा, पता नहीं। ये जगजाहिर हैं कि देश और समाज में परिवतॆन हो रहा है, लेकिन ये चेंजिंग एक खास हिस्से तक ही सिमट कर रह गयी है। हमें सोचना होगा कि क्यों नहीं हम थोड़ा लचीला रुख अपनाते हुए संबंधों को स्वीकार कर पाते हैं? हमारे आसपास ऐसी कई घटनाएं हो रही हैं, लेकिन हम अनजान हैं। सच्चाई जानने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि जो सच है, वह कड़वा है। हमारी जिद ने आज हमें दोराहे पर खड़ा कर दिया है। चाहे, वह प्रेम का मामला हो या धमॆ का, हर चीज को हमारा समाज अपनी जिद से जोड़ रखता है। भले ही इसमें किसी की जान क्यों न चली जाये। जिद अगर साथॆक हो, तो दुनिया बदल जाती है, लेकिन अगर निरथॆक हो, हमारा ही सवॆनाश होता है। गांधी की भी जिद थी, देश को आजादी दिलाने की, लेकिन हिटलर ने जिद की थी, दुनिया पर राज करने की। किसका क्या हश्र हुआ, ये तो सभी जानते हैं। कहीं धमॆ के नाम पर हिंसा और असहनशीलता बढ़ रही है, तो कहीं पहनावे को लेकर। हमारा मकसद यहां भाषणबाजी करने से नहीं है, लेकिन कम से कम आपको यह बताने की कोशिश है कि आनेवाली पीढ़ी के लिए कैसा सोशल म़ॉडल तैयार हो रहा है। मॉडनॆ सोसाइटी सिफॆ पहनावे या तड़क-भड़क से नहीं, बल्कि उस सोशल एटमोसफेयर से भी बनता है, जहां हर कोई सम्मानजनक तरीके से जीवन को जीने का रास्ता खोज सके। रिथिंकिग करते हुए, कम से कम हम आप आरती और उसके तीनों बच्चों के लिए ईश्वर से प्राथॆना तो जरूर कर सकते हैं।

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