Friday, December 5, 2008

एक सवाल है, जिसका जवाब चाहिए

क्या हम अपनी गलतियों को स्वीकार कर पाते हैं? खुले मन से, बिना झिझक के। ऐसा क्यों होता है कि जब हम से छोटा, कल का आया हुआ लड़का हमसे आगे निकल जाता है। उस लड़के और हममें क्या कमी रहती है। काम करते हुए दस साल गुजार डाले। लेकिन जो बात महसूस होती है, वह ये है कि आज के दौर में हर व्यक्ति खुद को जानकार समझता है। सीखने की प्रक्रिया मानो एक सीमा पर आकर ठहर जाती है। क्यों नहीं, एक छात्र के रूप में हम अपनी गलतियों को लगातार दूर करते चले जाते हैं। अपनी सवश्रेष्ठ पहचान बनाने की कोशिश क्यों नहीं करते? शायद, द्वेष और ईष्याॆ हमारे भीतर इतनी भर जाती है कि कोई खाली जगह नहीं बचती। कोई छोटा अगर ऊंचा बोले, तो उसकी बातों पर तुरंत उंगलियां उठती हैं, लेकिन अगर बड़ा ऊंचा बोलें, तो उस पर नहीं। बड़े- छोटे होने के इस फकॆ ने सीखने की दूरी को बढ़ा दिया है। बड़ा डांट सुनता नहीं या उसका जमीर खुद को किसी बात को पूरी तरह सीखने की स्वीकृति नहीं देता। एक प्रतिद्वंद्विता रहती है खुद से कि किस तरह अपने व्यक्तित्व को जबरदस्ती दूसरे के ऊपर थोप डालें। लेकिन समय पंख लगाकर गुजरता जाता है और हम खुद में तलाशते रह जाते हैं जवाब। आगे आपकी चिंतन के लिए छोड़ जाता हूं।

1 comment:

Udan Tashtari said...

सीखना एक सतत प्रक्रिया है..सीखते रहिये-बड़ों से, छोटों से और खुद से.

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