Wednesday, February 11, 2009

श्रीराम सेना की नौटंकी, पिंक चड्ढी अभियान, एक गेम या सही में कुछ

पब में लड़कियों पर श्रीराम सेना द्वारा हमले का विरोध और फिर उसके खिलाफ शुरू किया गया पिंक चड्ढी अभियान वतॆमान में उभरते भारत की त्रासदी को रेखांकित कर गया है। आज एक बड़ी आबादी नक्सलवाद, गरीबी, मंदी की मार, पलायनवाद, हिंसा और क्षेत्रीयता से प्रभावित है। आतंकवाद से तो खैर पूरा देश प्रभावित है। यह तो नासूर बनकर धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है।
इन सबसे अलग जब अखबारों के पन्नों को वैसी खबरों से पटा पाता हूं, जिनका हमारे सामाजिक जीवन को सुधारने में कोई योगदान नहीं है, तो मन विचलित होने की जगह आक्रोश से धधक उठता है। भाजपा को फिर राम मंदिर का झोंक चढ़ा। और तो कोई मुद्दा है ही नहीं। सोनिया गांधी को लेकर मचाया गया बवाल उनके लिए काम न आया और अब श्रीराम सेना न जाने कहां किस कोने से बीच में केंद्र बिंदु बनकर आ धमकी है।
श्रीराम सेना के लिए विरोध का स्तर भी बस पब तक ही लगता है। या बीच सड़क पर जा रहे किसी निदोॆष की पिटाई तक ही सीमित है। दूसरी ओर बौद्धिक वगॆ भी पिंक चड्ढी अभियान में जुट गया है। क्या कहें इस स्तर का और क्या कहें उनकी मानसिकता का। उलट वार में श्रीराम सेना साड़ी अभियान चलाने की बातें करती हैं। राम के नाम का जाप करनेवाले राम की महत्ता और उनके व्यक्तित्व को क्यों भूल जाते हैं, पता नहीं। राम ने कभी बिना वजह हिंसा को हथियार बनाने की वकालत नहीं की। तब फिर श्रीराम सेना क्यों हिंसा करती है?
दूसरी बात साड़ी और पिंक चड्ढी से अलग इनकी वकालत करनेवाले क्यों नहीं बहस और विचारधारा के स्तर पर अपनी बातें रखते हैं। बातें साफ हैं, चुनाव आने को है, माहौल पक्ष में है, तो बहती गंगा में हाथ धो डालो। इस ध्येय से कब तक और कहां तक राजनीतिक सफर तय होगा।
भारतीय संस्कृति की रक्षा की बात करने और खुलेपन की वकालत करनेवाले, दोनों ही आज भटके हुए हैं। ये पूरा विरोध बस लोकप्रियता को पाने के लिए किया गया कारगर हथियार बनता जा रहा है। जहां दशॆक सिफॆ रिमोट हाथ में लिये खबरों को देखते रहेंगे और उनका टाइम पास होता रहेगा। दूसरी ओर देश और समाज में जो समस्याएं हैं, जिनके निदान के लिए तैयारी की जरूरत है, उन सबसे लोगों का ध्यान हटता चला जायेगा। आज की तारीख में कितनी खबरें नक्सलवाद या किसानों से संबंधित आती हैं, सोचनेवाली बात है। सोचनेवाली बात ये है कि कंप्यूटर के सहारे हम जिस वरचुअल दुनिया में रहते हुए विरोध का तरीका अपना रहे हैं, उसमें कही न कहीं एक गेम के तहत हमारा इस्तेमाल भी हो रहा है। हमें उससे सावधान रहने की जरूरत है।

1 comment:

नदीम अख़्तर said...

मुझे लगता है कि कुछ लोग विरोध के लिए विरोध कर अपनी दुकानदारी चलाना चाहते हैं। मैं आपकी बातों स‌े पूरी तरह स‌हमत हूं। आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया, बहुत अच्छा लगा प्रभात जी। बीरू की चाय की दुकान तो छूट गयी है, लेकिन पुरानी बातें आज भी जेहन में घूमती हैं। आपको यहां देख कर बहुत अच्छा लगा। और आपकी लेखनी तो बहुत पसंद आयी। अब हर रोज़ आया करूंगा... नमस्ते. शैलेन्द्र जी, स‌ुनील जी, स‌त्यप्रकाश जी, स‌तीश भैया और स‌भी स‌ीनियर्स को मेरा आदाब कहियेगा हिन्दुस्तान में।
रांचीहल्ला

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