Sunday, July 5, 2009

टीवी की क्रांति न हुई होती, तो शायद हम इतने गिरे न होते

कल जब एक खास चैनल पर खास मुद्दे पर बहस हो रही थी, तो मुझे ये सोचने को मजबूर होना पड़ा कि आखिर हम एक खुले समाज में रह रहे हैं या फिर एक बंधे हुए, अनुशासित जीवन जीनेवाली संस्कृतिवाले समाज में। जो इस समाज के रहने के तरीकों से वास्ता नहीं रखते, ये लेख उनके लिए नहीं है। इस देश का दुर्भाग्य है कि यहां उन सब चीजों को ज्यादा प्रिफरेंस मिलती है, जो दोयम दर्जे का रुख अपनाते हुए देश और काल को दरकिनार कर गुजरते हैं। शायद यहां भी ऐसा ही है। मुद्दा खास है, बहस खास है, लेकिन उससे उस बात के हो रहे प्रचार को जो बल मिल रहा है, वह भी सोचनेवाली है। मैं सोचता हूं कि जब टीवी नहीं था, तो हमारा समाज ज्यादा बेहतर था। आज टीवी जरूर आया, लेकिन इसने सामाजिक ताना-बाना को मटियामेट कर डाला है। ग्लैमर की चासनी में डूबे टीवी के चैनलों को न तो समाज से कोई मतलब है और न ही इससे वास्ता कि उनके कार्यक्रमों को देखनेवाले कौन लोग हैं। टीआरपी की हाइ रेटिंग के सामने सारे विचार, दावे खोखले हो जाते हैं। टूटती अवधारणाओं का ठिकरा सिर्फ हम राजनीतिकों पर ही फोड़ते रहें, यही हमारी अब जिम्मेवारी बन गयी है। जबकि सच यही है कि हमारा पूरा मीडिया तंत्र इस दिशा में खुद ज्यादा बढ़कर काम कर रहा है। खास कानून, खास मुद्दा, खास लोग, बेहतर टीआरपी, अच्छा पैसा और खूब प्रचार, बस यही मकसद रह गया है। सोसाइटी की ऐसी की तैसी हो, किसे है इसकी परवाह।

समाज की कलपती आत्मा बार-बार हर वक्त अपनी सुरक्षा की गुहार लगाती फिर रही है, लेकिन उसके देखनहारों के हाथों में हीरे और नोटों की रस्सी बंध गयी लगती है। जब नक्सल हमले में कई पुलिसकर्मी मरते हैं, तब ऐसी बहस इसी मुद्दे पर चैनलवाले खुलकर क्यों नहीं करते हैं? हम जिस खुली बहस की आशा करते हैं, वे हमें इस मुद्दे पर नहीं मिलती। आंख मूदें बस उम्मीद करते हैं कि अगला कोई आकर हमें हमारी नींद से जगाएगा। टीवी संस्कृति के आने से पहले का जमाना ही शायद अच्छा था। जिसमें सिर्फ छपे शब्द ही वार करते थे। आज तो डिब्बे के अंदर से चीखते लोग बार-बार जेहन में आपके भटक जाने के खतरे का एहसास कराते हैं। अगर नहीं भटके , नहीं जानते, तो फिर दिमाग की नसों में बैठाते हैं कि ये जिंदगी आप के अगल-बगल है। पता नहीं, इस देश का क्या होगा?

2 comments:

HUMAN AND NATURE SOCIETY said...

टीवी की क्रांति न हुई होती, तो शायद हम इतने गिरे न होते/ Isse
behtar niskarsh aur kuchh nahi. Aazadi ke naam par ye kisi had tak gir aur gira sakte hain.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सत्य वचन, लेकिन समस्या टीवी से नहीं, उसे चलाने वालों से है जिन्होंने पूरा दुरुपयोग किया है.

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