Saturday, August 29, 2009

जरूरी है कि हम अपना श्रेष्ठ कर्म करें।

पहाड़ की ऊंचाई हमेशा आकर्षित करती है। उस ऊंचाई पर पहुंचने और उसे छूने की कल्पना मात्र से ही मन रोमांचित हो जाता है। जब हम किसी चीज की शुरुआत करते हैं, तो अनजान रहते हैं। लेकिन समय के साथ गोता लगाते-लगाते मन उस विषयवस्तु में ऐसा रम जाता है कि हम २४ घंटे उसी के बारे में सोचने लग जाते हैं।

ये सोचना ठीक भी है, लेकिन कभी-कभी गलत हो जाता है। हम जब किसी विषय को ज्यादा जान लेते हैं, तो एक अहंकार का बोध घर कर जाता है। हम खुद ये समझते हैं कि हममें काबिलियत है और हम दूसरों को समझा सकते हैं। उन्हें गुणी बना सकते हैं।

दूसरी ओर हमारा मानना है कि किसी व्यक्ति को खाना तो परोस कर आप दे सकते हैं, लेकिन उसे बाद की प्रक्रिया खुद ही निभानी होगी। इस कारण हम ये क्यों न मानें कि जो सीखने की प्रक्रिया हो, उसे पहले खुद पर लागू करें। उम्र बढ़ने के साथ सेचुरेशन प्वाइंट पर पहुंच जाने के बाद हम छद्म अहंकार की चादर ओढ़ लेते हैं। अच्छा तो ये हो कि हर व्यक्ति अपना श्रेष्ठ कर्म करे। जिससे उसे देखने और गुननेवाला व्यक्ति स्वतः प्रेरित होकर बेहतर बनने की दिशा में प्रयास करे।

वैसे भी विकास एक अंतहीन प्रक्रिया है। इसके लिए जरूरी है कि हम दूसरों की बजाय खुद की गिरेबान में झांकें और अपनी नेगेटिव ऊर्जा को पोजिटिव में बदलें।

देश, समाज और काल विचारों के गुलाम होते हैं। वैसे में विचारों की लड़ाई में खुद को श्रेष्ठ बनाने के लिए हमें संघर्ष तो करना ही होगा। उन्नत स्तर को उन्नत सोच से ही पाया जा सकता है। जो श्रेष्ठ कर्म में लगा हो, उसे दूसरों को उपदेश देने की फुर्सत कहां?

मैं अग्यानी, मैं बेचारा
खुद को खोजता एक आवारा
बंजर जमी में फसल की उम्मीद लिये
बस चला रहा हल मारा-मारा
आशा-निराशा के द्वंद्व के बीच
बस है वही एक सहारा
श्रेष्ठ कर्म कर हम अपना
क्यों न बनें टूटता तारा
हम दें दूसरों को ग्यान का भंडारा
एकलव्य पैदा होते रहते हैं
बस उन्हें चाहिए गुरु द्रोण दोबारा

4 comments:

विवेक सिंह said...

ये जो कविता लिखी है,

बहुत अच्छी लगी,

मेरी मानें तो इसे अपने परिचय में डाल दें,

( लो जी फिर सलाह दे डाली, गलती हुई :) )

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कविता वाकई बहुत अच्छी है।
हम ब्लागर हमेशा इतने जोश में होते हैं कि जो भी लिखते हैं तत्काल प्रकाशित कर देते हैं। कविता, कहानी जैसी परंपरागत विधाओं का लेखन ठहर कर पुनर्विचार मांगता है। इस कविता को ही देखें, यदि इस पर पुनर्विचार किया जाए तो इसे और खूबसूरती प्रदान की जा सकती है। जिस से इसे स्थाई महत्व मिले।

पुरुषोत्तम कुमार said...

ये जो सलाह देने वाले सज्जन हैं, वे जो कुछ लिखते-पढ़ते हैं, उससे ब्लागिंग की दशा और दिशा समझ में आती है। ऐसे लोगों से हार मानने की नहीं, समझाते रहने की जरूरत है। तभी कुछ साथॆक लिखा पढ़ा जा सकता है।

चंदन कुमार झा said...

बहुत ही सुन्दर विचार है आपके...कविता अच्छी लगी.

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