Thursday, October 22, 2009

हिन्दी चिट्ठाकारिता ने एक पड़ाव जरूर पार कर लिया

हिन्दी चिट्ठाकारी या हिन्दी ब्लागिंग जो भी कहें, भाषा के स्तर पर कुछ पहचान बनाने की ओर अग्रसर है। अब हिन्दी चिट्ठाकार होने के नाते आपसे लोग राय लेते हैं। किसी खास बात पर जानने की कोशिश करते हैं। कुछ रोज पहले हमसे २१ तारीख को मनाये जानेवाले गपशप दिवस को लेकर एक पत्रकार ने इस बारे में यानी गपशप पर हमारी राय लेनी चाही। छपी भी। मामले चाहे, जो भी हो, लेकिन ये इस बात का सूचक है कि रांची से टिपियाये जानेवाले मेरे चिट्ठे कोई व्यक्ति या समूह कितनी गंभीरता से ले रहा है। वैसे इस बारे में बोलने और कहने के लिए काफी सारी बातें हैं। बहसें भी होती हैं। लेकिन मुझे एक बात खटकती है कि हिन्दी की सेवा करने की अपील करनेवाले या हिन्दी के सेवार्थ खुद को समर्पित करने की बात करनेवाले लोग क्या खुद हिन्दी की अहमियत को कम नहीं कर रहे।

सेवा के दायरे में मौन क्रांति का एक स्वरूप पेश होता है। उस मौन क्रांति में बिना कुछ कहे किये जाने का भाव रहता है। लोग किसी खास उद्देश्य, बिना फल की चाह लिये किसी खास कर्म में लगे रहते हैं। हम भी उसी कर्म की चाह लिये रहते हैं। लेकिन खुद को उस स्तर पर ले जाने में संभव नहीं पाते हैं। ये जद्दोजहद चलती रहती है। कम से कम लेखन के स्तर पर आदमी को मैं हमेशा अकेला ही मानता हूं। किसी मंच पर लोग एक हो सकते हैं। लेकिन अगर किसी में बुद्धि है, तो वह दूसरे से कुछ न कुछ अलग ही होगा। इसलिए जब लोग चिट्ठाकारी में भी खास मुद्दे पर हां में हां का रट्टा लगाते हैं, तो ये विचार कौंधता है कि क्या बुद्धि के समान तार सचमुच एक व्यक्ति के दिमाग से दूसरे तक जुड़े रहते हैं। हम ये उम्मीद करते हैं, हर चिट्ठाकार दूसरे की बातों का तर्क के साथ काट करे। इससे बहस की जोर धार बनेगी, वह विचारों के समुद्र का निर्माण करेगी।

अब आज के लिहाज से हम कह सकते हैं कि २००९ के अंत तक आते-आते हिन्दी चिट्ठाकारिता ने एक पड़ाव को जरूर पार कर लिया है। सरकार फिल्म में विलेन का एक डायलॉग मन को टचकर गया कि अगर किसी को मारना या खत्म करना है, तो उस व्यक्ति को नहीं, बल्कि उसके विचार को मार दो। विचार यानी उसकी सोच को खत्म कर दोगे, तो आदमी खुद ब खुद खत्म हो जायेगा। इसलिए अपनी सोच, अपनी धार को कुंद मत होने दीजिए। उसे पत्थर पर रगड़-रगड़ कर तब तक चटकाते रहिये, जब तक कि उससे चिंगारी न निकलने लगे।

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