Sunday, May 16, 2010

कई सवालों के घेरे में है भाजपा

जब लालकृष्ण आडवाणी आगे हाथ जोड़े रथ यात्रा में निकले थे, तो हजारों लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा था। मैं भी भीड़ के एक कोने से लालकृष्ण  आडवाणी को देखकर रोमांचित हुआ था। मन में कई सपने जगे थे। एक सपना था कि कम से कम भाजपा कांग्रेस के विकल्प के रूप में देश में उभरेगी। समय के साथ इस पार्टी के नेताओं मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, उमा भारती, गोविंदाचार्या जैसे नेता अपनी वाकपटुता से जादु चला देते थे। एक ऐसी अनुशासित पार्टी के रूप में भाजपा उभरती दिखती थी कि मन बाग-बाग हो जाता था। आज उस पार्टी की खराब हालत देखकर मन शर्मिंदा हुआ जाता है। गडकरी साहब जब से सर्वेसर्वा हुए हैं, कोई ऐसा आधार तय होता दिखाई नहीं देता है, जहां से लोगों का विश्वास फिर से जगना शुरू हो। प्रमोद महाजन ने मीडिया में अपने दिनों में भाजपा को एक सर्वशक्तिमान पार्टी के रूप में स्थापित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन उनके जाने के बाद पता नहीं क्या हुआ भाजपा का मीडिया मैनेजमेंट गड़बड़ा गया। श्री गडकरी जी का हालिया बयान भाजपा को ऐसे दोराहे पर खड़ा कर रहा है, जहां उसके नेताओं के आत्मविश्वास और सही दिशा-दशा पर उंगली उठ रही है। भाजपा के नेता उन हजारों सपनों को तोड़ने के कसूरवार हैं, जो उन्होंने मंदिर बनाने के नाम पर दिखाये। जो उन्होंने खुद को एक अनुशासित पार्टी के रूप में पेशकर दिखाये। मुझे आज भी टीवी पर उमा भारती द्वारा खुली बगावत कर मीटिंग से जाने का दृश्य बखूबी याद है। उसके बाद से भाजपा से उसके नेता गोविंदाचार्य, बाबूलाल मरांडी और अन्य लोगों के जाने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक जारी है। झारखंड में वे पिछले तीन सप्ताह से क्या कर रहे हैं, वह सारी दुनिया जानती है। जो पार्टी सत्ता मोह में इतनी फंस जाये कि अपनी प्रतिष्ठा को दांव पर लगा दे, तो उसके बारे में क्या कहें। भले ही अर्जुन मुंडा सीएम हो जायें या कोई और, लेकिन उसके साथ ही सपने और भरोसे के टूटने का जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह रुक नहीं रहा है। क्या भाजपा कांग्रेस के उभरते नेतृत्व का मुकाबला करने के लिए तैयार है? क्या भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता पार्टी के साथ जुड़कर सम्मानित महसूस करते हैं? बात सम्मान के स्तर पर इसलिए हो रही है कि क्योंकि उसके कई जमीनी कार्यकर्ता या तो नाराज होकर
सिमट गये हैं या जनता के बीच पार्टी के प्रतिनिधि के तौर पर खुद को रिप्रेजेंट नहीं करते। गडकरी के आने के बाद भाजपा बतौर एक पार्टी समझौतापरक ज्यादा लगती है।

2 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

भाजपाई न तो मीडिया मैनेज कर पाते हैं, न ही अपने लोगों के काम करा पाते हैं और न ही प्रोपेगैण्डा कर पाते हैं...

sanjay said...

Lagta hai, BJP ke "Is Raat Ki Subaha Nahi

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