Wednesday, July 28, 2010

छोटे शहरों में रिश्तों के खत्म होने की कहानी

रिश्ते तो बनते बिगड़ते रहते हैं. रिश्ते कई प्रकार के होते है, जिसमें कुछ अच्छे, तो कुछ बुरे. रिश्ते अगर सीमा के अंदर बनें, तो अच्छे लगते हैं. सीमा को पारकर बनें, तो चोट पहुंचाते हैं. छोटे शहरों में रिश्तों के खत्म होने की कहानी तनाव पैदा कर रही है. आदमी अपनी पत्नी,बच्चों या मां-बाप के प्रति वफादार नहीं रह रहा. बेटे-बेटियों को माता-पिता की परवाह नहीं रह रही. रिश्ते अनजानों से बनते हैं. वे अनजाने ज्यादा अपने लगते हैं बनिस्पत की दूसरों के. रिश्तों के कत्ल की कहानी हाल के साल में शायद निरूपमा के मामले से ज्यादा बनती नजर आती है. जहां माता-पिता पर ही बेटी की खुशियों को रौंद देने का आरोप लगा. पटना में पत्नी ने अपने पति का ही कत्ल करा डाला. मारे गएपति पर वैसे ही गलत किस्म का रवैया रखने का आरोप लग रहा है. पहले लोग इन घटनाओं को बड़े शहरों की बड़ी बातें कह कर टाल देते थे. लेकिन आज ये छोटे शहरों की कहानी बनती जा रही है. छोटे शहर अपनी मर्यादा खो दे रहे हैं. ये तरक्की की कहानी है या और कुछ पता नहीं. लेकिन अगर सही में कहें, तो जिंदगी के तबाह होने के निशान मिलने लगे हैं. रांची में पं बंगाल का युवक मारा जाता है. लव मैरिज की हुई उसकी विधवा को ये नहीं पता होता है कि उस युवक का घर कहां है. जाहिर है कि घरवालों से युवक कटा होगा और खुद की मर्जी की जिंदगी जी रहा होगा. स्वच्छंद जीवन जीने की चाहत बुरी स्थिति पैदा कर रही है.पहले फिल्मों में जमाने से बगावत की बात अच्छी लगती थी. लेकिन आज बगावत नहीं, होश संभालने की स्थिति आन पडी है. समाज को संतुलन न बिगड़े, इसके लिए पहल कौन करेगा, ये सवाल है. सोशल साइट्स पर बहस, बतकही और चिरकुटई से कोई क्रांति नहीं आ जाएगी. वैसे में ये छोटे शहर के लोग कैसे खुशी का जीवन जीएंगे, ये सबसे बड़ा सवाल है.

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ा दुखद सत्य उजागर किया आपने आज।

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
There was an error in this gadget
There was an error in this gadget

अमर उजाला में लेख..

अमर उजाला में लेख..

हमारे ब्लाग का जिक्र रविश जी की ब्लाग वार्ता में

क्या बात है हुजूर!

Blog Archive