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Sunday, February 20, 2011

मुझे इस शहर में बेगानेपन का अहसास घरने लगा है.


आज-कल एक असीब से द्वंद्व से गुजर रहा हूं. ये द्वंद्व शायद उन तमाम लोगों के मन में भी जरूर मौजूद होगी, जो सामाजिक सरोकारों के बीच मरते समाज को लेकर चिंतित हैं. मेरे लिये, मेरे सहकर्मियों के लिए और मेरे तमाम साथियों के लिए ये द्वंद्व रुलाने वाला है. साथ ही ये चिंता देनेवाला भी है कि हमारा समाज सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट की तर्ज पर काम कर रहा है. दो-तीन दिन बीते होंगे, एक खबर आयी कि रांची में एक आईएफएस की मौत हो गयी. उनकी दिमागी हालत भी पिछले कई सालों से खराब थी. सबसे जो गौर करनेवाली बात थी, वो ये थी पत्नी उन्हें छोड़ मुंबई में रहती हैं. ऐसे ही कुछ दिन पहले रांची की एक प्रोफेसर की तन्हाई ने जान ले ली. उनके दोनों बेटे रांची से बाहर बेहतर नौकरी में हैं. प्रोफेसर भी नौकरी में थीं. कुछ साल और बचे थे. फिनांसियल तौर पर भी कोई प्राब्लम नहीं था. इन सारे हालात के बीच भी मौत को गले लगाना मुनासिब समझा. यहां गौर करनेवाली बात ये है कि यहां पर दोनों व्यक्ति बौद्धिक स्तर पर जीनियस की भूमिका में थे. सोसाइटी के ऐसे तबके से संबंध रखते हैं , जहां से सोसाइटी के लिए बदलाव की दिशा तय होती है. लेकिन पारिवारिक स्तर पर वे एकाकी हो गए थे. जिंदगी के कठिनतम दौर में उन्हें देखनेवाला कोई नहीं था. ज्यादा दिन नहीं गुजरे राम टोप्पो को लेकर फेसबुक पर अपील की. कुछ लोग मदद को आए, लेकिन जैसे कमेंट्स की उम्मीद थी, वैसी न आयी. मैं यहां आज के सिस्टम को गाली नहीं दूंगा, क्योंकि ये सिस्टम हमारी ही बनाया हुआ है. मेरे मन से गाली उस समाज के लिए निकल रही है, जिसमें मैं रहता हूं. मैं जिस समाज में रहता हूं, वहां जिस रफ्तार से स्वकेंद्रित होने की ट्रेंड चल पड़ा है, उस ट्रेंड को गाली देने की इच्छा होती है. हमारे युवा साथी अपने ही संसार में इतने मस्त हैं कि उन्हें ये देखने की फुर्सत नहीं मिल रही है कि आसपास क्या हो रहा है. रांची जैसा शहर जो पहले अपनी हरियाली के लिए जाना जाता था, आज मरते समाज के शहर के रूप में अपनी पहचान बना रहा है. मुझे इस शहर में बेगानेपन का अहसास घरने लगा है. ये शहर पहले अपना सा लगता था. सुजाता से लेकर अल्बर्ट एक्का चौक तक में २० साल पहले उतना दबाव नहीं महसूस करता था, जितना आज महसूस करता हूं. तेज रफ्तार से भागता शहर डरा रहा है. इसके फैलाव का अंदाजा भी भयभीत कर देता है. लेकिन इस फैलाव ने जिस सूनापन को बढ़ाया है, उससे मन की तड़प बढ़ती जा रही है.

Wednesday, July 28, 2010

छोटे शहरों में रिश्तों के खत्म होने की कहानी

रिश्ते तो बनते बिगड़ते रहते हैं. रिश्ते कई प्रकार के होते है, जिसमें कुछ अच्छे, तो कुछ बुरे. रिश्ते अगर सीमा के अंदर बनें, तो अच्छे लगते हैं. सीमा को पारकर बनें, तो चोट पहुंचाते हैं. छोटे शहरों में रिश्तों के खत्म होने की कहानी तनाव पैदा कर रही है. आदमी अपनी पत्नी,बच्चों या मां-बाप के प्रति वफादार नहीं रह रहा. बेटे-बेटियों को माता-पिता की परवाह नहीं रह रही. रिश्ते अनजानों से बनते हैं. वे अनजाने ज्यादा अपने लगते हैं बनिस्पत की दूसरों के. रिश्तों के कत्ल की कहानी हाल के साल में शायद निरूपमा के मामले से ज्यादा बनती नजर आती है. जहां माता-पिता पर ही बेटी की खुशियों को रौंद देने का आरोप लगा. पटना में पत्नी ने अपने पति का ही कत्ल करा डाला. मारे गएपति पर वैसे ही गलत किस्म का रवैया रखने का आरोप लग रहा है. पहले लोग इन घटनाओं को बड़े शहरों की बड़ी बातें कह कर टाल देते थे. लेकिन आज ये छोटे शहरों की कहानी बनती जा रही है. छोटे शहर अपनी मर्यादा खो दे रहे हैं. ये तरक्की की कहानी है या और कुछ पता नहीं. लेकिन अगर सही में कहें, तो जिंदगी के तबाह होने के निशान मिलने लगे हैं. रांची में पं बंगाल का युवक मारा जाता है. लव मैरिज की हुई उसकी विधवा को ये नहीं पता होता है कि उस युवक का घर कहां है. जाहिर है कि घरवालों से युवक कटा होगा और खुद की मर्जी की जिंदगी जी रहा होगा. स्वच्छंद जीवन जीने की चाहत बुरी स्थिति पैदा कर रही है.पहले फिल्मों में जमाने से बगावत की बात अच्छी लगती थी. लेकिन आज बगावत नहीं, होश संभालने की स्थिति आन पडी है. समाज को संतुलन न बिगड़े, इसके लिए पहल कौन करेगा, ये सवाल है. सोशल साइट्स पर बहस, बतकही और चिरकुटई से कोई क्रांति नहीं आ जाएगी. वैसे में ये छोटे शहर के लोग कैसे खुशी का जीवन जीएंगे, ये सबसे बड़ा सवाल है.
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