Tuesday, February 15, 2011

इस हड़बड़ी को रोकना जरूरी है..

कल ही की बात थी, फेसबुक पर कमेंट्स और स्टेटस के जरिये इजिप्ट में आंदोलन की बड़ी इमारत खड़ी कर दी गयी. इतनी बड़ी की उसमें मोबारक साहब की गद्दी चली गयी. ट्यूनीशिया में भी कुछ ऐसा ही सीन है. इंटरनेट क्रांति का दूसरा स्वरूप बनता जा रहा है. कश्मीर में भी लोगों ने अपने जज्बातों को फेसबुक पर डाल दिया. इसे लेकर भी विवाद हुआ. सारा कुछ इतना ओपेन है कि इस वाइड स्पेस को हम इनफिनिटी के तौर पर देख सकते हैं. अंतरिक्ष में जैसे ब्लैक होल का कांसेप्ट है, वैसा ही कांस्पेट हमारे विचार से इस तंत्र को लेकर है. इसकी जड़ें चाहें जितनी भी बड़ी क्यों न हो, इसकी गहराई की सीमा का अंत नहीं होगा.

मृणाल जी का पिछले दिनों एक लेख भी पढ़ रहा था, जिसमें उन्होंने इन नेटवर्किंग साइट्स, ब्लाग्स और फिल्मों के लगातार उन्मुक्त होते जा रहे मामले पर चिंता जतायी है. हम जानते हैं कि पहले का साहित्य और सृजन एक अनुशासन लिये होता था. उसका एक व्याकरण होता था. लेकिन आज के वाइड स्पेस में बातों को जल्दी से जल्दी कह देने की इतनी हड़बड़ी है कि सारी बातें गौण हो चली हैं. मृणाल जी ने कहा कि गाली का हम तब ही प्रयोग करते हैं, जब हमारी तर्क की शक्ति खत्म हो जाती है. लेकिन आज कल के लोग तर्क क्यों नहीं करते? ये एक बड़ा सवाल है. सवाल इतना बड़ा है कि इसे लेकर तमाम समाजशास्त्रियों की फौज भी उसे सुलझा नहीं सकती. क्योंकि जिस बुनियाद पर इन सवालों को खड़ा किया गया है, वो आज की तारीख में काफी बड़ी हो गयी है. ज्यादातर लोग ये नहीं सोच रहे हैं कि आज कल की पब्लिक को अपने जज्बातों को बयां करने की इतनी हड़बड़ी क्यों है. ऐसा नहीं है कि पहले क्रांति नहीं हुई होगी. बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और तमाम परेशानियां पहले भी थी, लेकिन आज इन बातों को लेकर एक हड़बड़ी है. मोबाइल में भी दस शब्दों को बदले एक शब्द में एसएमएस कर काम चलाया जा रहा है. इतनी जल्दबाजी है, जैसे लगता है कुछ छूट रहा है. जो जितना शार्ट है, उतना पसंदीदा है, जैसे ट्विटर. ऐसे में लोग तर्क करने के बदले गाली या निगेटिव शब्दों का इस्तेमाल कर अपने जज्बात का इशारा कर दे रहे हैं.

अब सोचिए कि आखिर इस शार्ट हो जा रही प्रक्रिया का परिणाम क्या होगा. ब्रिटिश राज में खड़ा किया गया सिस्टम अगर हमारी डेवलपमेंट का आधार है, तो हमारे यहां खड़ा किया गया सिस्टम वैसा क्यों नहीं हो रहा. हमारे यहां भी वैसी ही हड़बड़ी है. लोग गलत तरीके से ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाने की जुगाड़ में भिड़ गए हैं.
ऐसी हड़बड़ी है कि हमारे यहां घोटाले ही घोटाले हो रहे हैं. इस हड़बड़ी को रोकना जरूरी है. नेटवर्किंग साइट्स, ब्लाग्स या फिल्मों में सृजन के समय में थोड़ा अनुशासन होना जरूरी है.

आमिर के फिल्म सबजेक्ट लिये रहते हैं, क्योंकि वे हड़बड़ी में नहीं बनाए जाते हैं. लेकिन जब कोई दूसरी फिल्म जैसे नो वन किल्ड जेसिका बनायी जाती है, तो उसमें बिंदास और बेबाक पत्रकार को गाली बकते दिखाया जाता है. हमारे हिसाब से पत्रकारिता में भी ऐसी गाली बकती पत्रकार को सफल होते कम ही देखा जा सकता है. ऐसे में जिस मैसेज को फिल्मों में दिखाया जा रहा है, वह भी किसी करियर या सोसाइटी को निगेटिव रूप दिखा रहा है. ऐसे में हमारे समाज को ज्वालामुखी पर खड़ा करने की कोशिश हो रही है.

पढ़ाई में प्रेशर के नाम पर मार्किंग सिस्टम को खत्म किया जा रहा है. जाहिर है कि हमारा सिस्टम आराम से काम करने या तनाव खत्म करने पर जोर दे रहा है. ऐसे में वह चीजों को आसान बनाते हुए उसे इतना फास्ट बना रहा है कि बिना किसी तरह की तंगी लिये फटाफट स्टूडेंट बाधा पार कर ले. इसमें भी एक हड़बड़ी है. आखिर हमारी सोसाइटी के भीतर धीरज क्यों खत्म हो रहा है. इसे लेकर चिंतन करने की जरूरत है. दुनिया कितनी भी फास्ट हो, लेकिन इंडिया कम से कम इतना फास्ट न हो जाए कि संभलने का वक्त ही निकल जाए.

2 comments:

किलर झपाटा said...

ठीक कहते हैं आप प्रभात भाई।

प्रवीण पाण्डेय said...

कहीं तो थोड़े से दर्द में बिलबिला उठना और कहीं पर सह कर भी कुछ न कहना, देश विचित्र स्थिति से गुजर रहा है।

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