Wednesday, February 25, 2015

अब बदल गयी है जिंदगी

बरियातू स्थित हमारा मुहल्ला भी अब पहले जैसा नहीं रहा. आज जब बाहर बारिश हो रही है और हम रूम में बैठकर बाहर गिरते बूंदों को टटोलने की कोशिश कर रहे हैं, तब उन बीते दिनों में सड़कों पर पैदल चलते हुए भींगने का दौर भी याद है. उन दिनों कालोनी के गोलचक्कर से लेकर स्कूल तक ही अपनी दुनिया सिमटी हुई थी. गोलचक्कर से एक किमी की दूरी पर स्थित मंदिर तक चक्कर लगाकर ही खुद को संतुष्ट कर लिया करते थे. यूं कहें कि हम अपने बनाए कम्फर्ट जोन में काफी खुश थे. उन दिनों जो भी फिरायालाल जाता, वह हमें यही बताता कि रांची गए थे, यानी रांची मायने फिरायालाल. बरियातू तो बाहरी इलाके जैसा था. लेकिन अब रांची फैल गई है. बदल गई है. हमारा मुहल्ला भी अब दूर-दूर तक फैल गया है.
वैसे भी बदलना तो हमारी नियति में है. हम हर रोज बदलते हैं. विचार से. दिल से. नजरिए से. बचपन भी हर क्लास के लेवल पर बदलता रहता है. अचानक से दुनिया बड़ी लगने लगती है. काफी बड़ी. रांची के बरियातू में स्थित तीन रूम के छोटे से फ्लैट में हम चार भाई-बहनों की दुनिया दौड़ती रहती थी. उन दिनों स्कूल के हेडमास्टर साहब थोड़े कड़क किस्म के थे. उन्हें जब सजा देनी होती थी, तो आंख दिखाकर काम तमाम कर देते थे. सब बताया करते थे कि वे स्वतंत्रता सेनानी थे. उनकी प्रतिष्ठा भी काफी थी. हमेशा खादी पहनना उनकी आदत में शुमार था. घोर गांधीवादी. किसकी मजाल थी कि कोई चूं तक बोले. याद है कि ज्ञानी जैल सिंह राष्ट्रपति बने थे. हमें परीक्षा में नए राष्ट्रपति जी के बारे में सवाल भी पूछा गया था. दुनियादारी से दूर हम नन्हे बच्चे पद और उसकी महत्ता से अनजान थे. हम नए राष्ट्रपति महोदय का नाम नहीं जानते थे. तब हमें हमारी टीचर्स ने खुद आकर सवाल के उत्तर लिखाए थे. उस समय प्रधानमंत्री के नाम पर इंदिरा जी का नाम जुबान पर रटा था.
अब अगर क्लास रूम की बात करें, तो अपने मिडिल स्कूल में मैं बैक बेंचर था. न ज्यादा दोस्ती और न ज्यादा दुश्मनी. स्कूल के पीछे के मैदान में लंच के वक्त लड़कों का हुजूम खेल खेलने में मगन रहता था. उस खेल में सबसे हिट था, तो बम पाट. जिसमें रबड़ की गेंद से एक-दूसरे को निशाना बनाना पड़ता था. मुझे उसमें मार ही ज्यादा पड़ती थी. लेकिन फिर भी पार्टिसिपेट जरूर करता था.
क्लास फोर में था. एक दिन मेरे बगलवाले बेंच पर एक लड़का बैठा मिला. नाम पूछा, बताया संजय बोस. पेंटिंग में महारत हासिल थी उस लड़के को. उसकी पहली पेंटिंग टार्जन की देखी. सुंदर लगा था उस वक्त. हम उतनी सुंदर चित्रकारी नहीं कर पाते थे. उसे देखकर खुद को कमतर पाता था. कुछ सीखने की गुंजाइश से उसे दोस्त बना बैठा. बाद में बड़े होने पर संजय ने फोटोग्राफी में भी ऐसी महारत हासिल कर ली कि आज वह कई लोगों के लिए गुरु समान हो गया है. उन दिनों स्कूल से आते वक्त उसके घर पर ठहरने की जरूरत महसूस होती थी. अमरूद जो लेना होता था. स्कूल के लड़के भी अमरूद पाने के चक्कर में संजय के दोस्त बन चले थे. लेकिन मैं और मेरा भाई उसमें थोड़ा आगे रहे. हमने उससे पक्की दोस्ती कर ली. फिर शाम में शुरू हुआ संजय के घर पर गपशप करने का दौर. जहां होते थे हम तीन जन मैं, मेरा भाई और संजय. साथ में होती थी डेक से उठती किशोर की आवाज. संजय के यहां गुजरी शामों में मैंने जगजीत सिंह, किशोर, लता, अभिजीत सबके गीत झूमकर सुने.
हमारी दुनिया कुछ दिनों के लिए बस संजय के घर पर ही शाम के वक्त गुजरती रही. शतरंज की बाजी भी खूब चलती. जिसमें ज्यादातर समय जीतने की जिद लिए संजय के भाई साहब टिके रह जाते थे. चाय और गप्पबाजी के आगे बाहर की दुनिया फीकी नजर आती थी. हमारी जिंदगी स्वकेंद्रित हो चली थी या यूं कहें हम खुलकर जी रहे थे और खुद में खुश थे. बेफिक्र, बिना चिंता के. उस वक्त यह नहीं जानते थे कि बाद की दुनिया कितनी कठोर, प्रोफेशनल और इमोशनलेस हो जाएगी. जिसमें सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट का ही मामला चलता है.

Friday, January 9, 2015

हर दिन नशे की माफिक होता है....


जाने-अनजाने जब अगल-बगल या पड़ोस के किसी बंदे से उसके दर्द के किस्से पूछें, तो आपको अपना दर्द कमतर नजर आयेगा. मुश्किलें तो आयेंगी और चली जायेंगी.. लेकिन खुद के बनाये संसार से इतर जब खिड़की के बाहर की दुनिया में झांकेंगे, तो छोटी दुनिया बड़ी और आपका संघर्ष छोटा नजर आयेगा. जिंदगी समंदर है, गोता लगाइये. हर दिन नशे की माफिक होता है, बस
उसे खुलकर पीने को जिगर चाहिए.

Thursday, August 7, 2014

रेशमा का जाना...

पिछले साल अगस्त में ही. रात के एक बजे. जब सारी दुनिया सो रही थी, मेरे घर के दरवाजे के पास हलचल थी. हलचल एक कुत्ते की वजह से, जो बारिश से बचने की कोशिश में ऊपर चढ़ आया था. किसी तरह उसे नीचे उतारा और घर में घुस गया. सुबह उठा, तो दुम हिलाता वह पीछे चला आया. न जाने शहर के किस कोने से आया था. मैं न चाहते हुए भी मां से एक रोटी मांगकर लाया और उसे खाने को दे दिया. वहां से आफिस मीटिंग के लिए आया, तो रात की घटना दिमाग को बेचैन कर दे रही थी. फिर जब घर आया, तो उसी कुत्ते को फिर अपने दरवाजे पर पाया. न जाने कौन सी चीज उसे मेरे पास खींचकर ले आ रही थी. न तो मैं उससे उस रात से पहले मिला था और न ही कालोनी में कुत्तों के झुंड में देखता था. जो भी हो. हमारी दोस्ती जम गई. हर रोज हम उसे कुछ खाने को देते, तो वह भी कुछ देर के लिए इधर-उधर उछल-कूद कर हमें इम्प्रेस करने की कोशिश करती. अच्छा लगता था. मेरी बेटियों ने उसे नाम भी दे दिया था रेशमा. प्यारा नाम. बेटियों के पास खासी प्लानिंग थी उसे क्या और कब खिलाना है.

हमारे घर के सामने बड़ा सा मैदान है. रेशमा रोज उसी में इधर-उधर दौड़ा करती थी. कालोनी के सारे कुत्तों की वह सरदार थी. फिर एक दिन अचानक रेशमा गायब हो गई. रोज मेरी और मेरी बेटियों की नजरें उसे देखने के लिए घर के आसपास और मैदान के दूर किनारे तक टटोलतीं और फिर चुपचाप हम आफिस और बेटियां स्कूल के लिए चल पड़तीं. एक टिस रह गई थी मन में-आखिर रेशमा कहां चली गई. कुछ दिनों के लिए आई. प्रेम की भाषा पढ़ा गई. आज भी हम जब शहर की गलियों में अपने स्कूटर पर चलते हैं,  तो निगाहें उसे खोजती हैं. कहीं वह मिल जाए.

आज भी कई शख्स जाने-अनजाने हमसे अनजाना रिश्ता बनाकर चले जाते हैं. हम इस इंतजार में रहते हैं कि वह फिर आएगा. लेकिन ऐसा होता नहीं है. कई बार कोई अनजाना अचानक आता और फिर चला जाता है, लेकिन अपने रिश्ते की गर्माहट से हमें इतना सराबोर कर जाता है कि बस हम उसके लिए शुक्रिया शब्द का ही इस्तेमाल कर पाते हैं. भागते जीवन के बीच रेशमा का आना और चला जाना हमारे लिए कुछ ऐसा ही था. उसके बाद से मैं अपने क्वार्टर और उसके आसपास मौजूद रेशमा के तमाम हमराज रहे दोस्तों को भी चुपचाप और शांत देखता हूं. रेशमा के रहते उनकी ऊर्जा, लय और दौड़ने के मौजूद सुरूर को अब नहीं देख और महसूस कर पाता हूं. रेशमा आयी तो दो महीने के लिए थी, लेकिन जाते-जाते कुछ ऐसा कर गई कि बस उसके लिए शब्द भी कमजोर पड़ जा रहे हैं. ऐसे देखें, तो अपने घर से निकलने के बाद दुनिया में सड़क पर या मैदान में हर कोई बादशाह है. उसके पास अगर कुछ देने के लिए रहता है, तो प्रेम से भरा व्यवहार या दो मीठे बोल. लेकिन आज के प्रोफेशनल होते जमाने में हम वह भी नहीं दे पाते. दुनियादारी में यह सिलसिला चलता रहेगा और हम भी इस गणित को सुलझाते रहेंगे. लेकिन इसके इतर जो एक दुनिया है, जहां सबकुछ राफ-साफ है, वहां मामला क्लीयर रखना पड़ता है. क्योंकि यहां पर दिल या रिश्ते पैसा नहीं, बल्कि अपनापन मांगते हैं

Thursday, July 24, 2014

जिंदगी को हाय, रैट रेस को बाय



बच्चे बड़े हो रहे हैं. दिनों दिन लंबे. उनके कपड़े छोटे हो रहे हैं. परिवर्तन का अहसास. जिसे टरकाया नहीं जा सकता. छुपाया नहीं जा सकता. न खुद से और न दुनिया से. 40 साल की उम्र में आप खुद से सवाल करते हैं-आगे क्या? आगे आपके लिए अब कैसी जिंदगी होनी चाहिए?  कई दोस्त नाकामयाबी या फलां...फलां के कामयाब होने की कहानी कहते हैं. मैं सुनता रहता हूं. मैं उनसे सीखने की कोशिश करता रहता हूं. सिस्टम में बने रहने के लिए जरूरी है. लेकिन अब उस चूहा दौड़ या रैट रेस में रहने का दिल नहीं करता, जिसमें न तो सिस्टम बनता है और न रिलेशन. कई लोग खुद के कामयाब होने की कहानी खुद बताते हैं. मैं नहीं बताता, क्योंकि मैं खुद को तोप नहीं मानता और  न ही उन चुनिंदा लोगों में शुमार पाता हूं, जो पत्रकारिता या जीवन में शहंशाह या यूं कहें खुद को तोप कहलाना पसंद करते हैं. 

आज कल जब फ्री हूं. बेटियों के साथ सुबह-शाम खेलता हूं. उनकी टेंशन को अपनी मानकर झेलता हूं, तो पाता हूं कि अपनी दुनिया के कितने अहम हिस्से को मैं रैट रेस में शामिल होने के दौरान मिस करता था. आसपास देख रहा हूं, परिवार टूटते हुए. बुजुर्गों को सहारे के लिए भटकते हुए. फ्लैट कल्चर डेवलप होते हुए, जिसमें सबका अपना एक घर होगा. उस घर में सिर्फ दो आदमी और दो बच्चे होंगे. दीवारों पर न तो पेंसिल से लिखी गई गंदगी मिलेगी और न ही बगल की चाची जी के ताने या मुस्कुराहट. वैसे भगवान की दया से जहां रहता हूं, वहां खूब बातें होती हैं. आज भी जिंदादिली कायम है. मेरे हिसाब से मेरे लिए अगले दस साल एक संतुष्टि से भरा जीवन होना चाहिए. जिसमें न तो खूब पैसा हो और न खूब टेंशन. पेट भर जाए. लोग मुस्कुरा कर आगे बढ़कर गले मिलें और ढेर सारी बातें करें देश और दुनिया की. मुझे उनकी कामयाबी की कहानी और उनके शोहरत के चांद से कोई मतलब नहीं. 

मैं जानता हूं कि जिंदगी में चलते हुए कई मोड़ आए होंगे. कहीं उन्होंने जंग जीती होगी, तो कहीं हारी होगी. लेकिन मुझे उनकी उस व्यक्तिगत जंग से कोई मतलब नहीं है. मुझे उनसे एक मुलाकात भर में मिलनेवाली आत्मायता से मतलब है. मैं दो रुपए की चाय की प्याली और जोरदार ठहाकों के बीच सुकून के पल को महसूस करना चाहता हूं. जाहिर है कि जो रैट रेस में शामिल होने के लिए दीवाने बने फिरते हैं, उन्हें इन चीजों के लिए फुर्सत नहीं है. लेकिन जिन्हें इनसे कोई मतलब नहीं है, वे मेरी जिंदगी के आनेवाले दस सालों में कभी भी कहीं भी खुलकर मिल सकते हैं.

Monday, April 22, 2013

संकट की घड़ी है. संभलना है तो संभलिए, नहीं तो...

अपने पड़ोस में नजर डालिए. आपको कुछ अहसास होगा. अहसास ये कि आप न जाने कितनी बातों से अनजान रहते हैं. न जाने कितने परिवर्तनों से आप अब तक अछूते रहते हैं. यानी कि आसपास की गुजरती जिंदगी चुपचाप किनारे से निकल जाती है. ऐसे ही जब दिल्ली में बच्ची के साथ दुष्कर्म जैसे मामले होते हैं, तो हम थोड़े सकते में आते हैं. मीडिया भी अलर्ट हो जाता है.डाटा पेश किया जाता है. क्राइम चारों ओर नजर आने लगता है. पहले होते रहे क्राइम से अनजान थे, लेकिन अब अचानक से पूरी जानकारी लेने में जुट जाते हैं. पर ये हम सबके लिए बस चार दिन का खेला है. चार दिन बाद जिंदगी के मेले में हम फिर भूल जाएंगे सबकुछ. सच कहें तो मीडिया, नेता और हर व्यक्ति दोहरे चरित्र का जीवन जी रहा है. मीडिया जहां महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को लेकर सजग और अलर्ट है, वहीं खुद अपनी वेबसाइट्स पर हिट पाने के लिए कई हथकंडे अपनाता नजर आता है. नेता एंगर मैनेजमेंट का तरीका अपना कर चुप्पी साध लेते हैं,तो पुलिस महकमा निलंबन और ट्रांसफर का तरीका अपनाता है. यूं कहें कि मामले पर लीपापोती कर अपना स्वार्थ साधा जाने लगता है. हम मिडिल क्लास वाले वैसे भी लोअर लेवल यानी निचले स्तर पर जी रहे लोगों से दूरी बनाए रखने में यकीन रखते हैं. आज भी निचला तबका मीडिया, एंटरटेनमेंट और एजूकेशन से महरूम है. छोटे शहर, गांव के किसान जब दिल्ली या दूसरे बड़े शहरों में जाते हैं, तो फिल्मी सपने देखते हैं. सपना देखने का हक हर किसी को है. इससे हम आप इनकार नहीं कर सकते. लेकिन जब ये सपना पूरा नहीं होता है, तो वह छोटा आदमी तिलमिला जाता है. उसका विवेक मर जाता है और वह रेप या अस्मत लूटने जैसी घटना को अंजाम दे देता है. इन सब बातों में सबसे अहम फिल्म इंडस्ट्री का नजरिया है. डायन, सेक्स और लव इन तीन थीम पर फिलहाल इनकी पूरी इमारत टिकी है. ऐसे में सनी लियोन जैसी पॉर्न स्टार को बॉलीवुड में इंट्री करा कर जब इंडियंस को उनसे परिचय कराया गया, तो उसके दूरगामी परिणाम के बारे में किसी ने भी नहीं सोचा होगा. सनी लियोन जी का नाम गुगल पर डालते ही हर किसी का उनकी जीवनी से परिचय हो जाता है. ऐसे में जो अधकचरा ज्ञान निचले तबके के लोग उनकी जीवनी को इंटरनेट पर पढ़ने के बाद पाते हैं, उसका कुप्रभाव बाद में देखने को मिलेगा ही. अब इन घटनाओं के बाद ज्यादा एनालिसिस करने की भी जरूरत नहीं है. संकट की घड़ी है. संभलना है तो संभलिए, नहीं तो...

Wednesday, March 27, 2013

मेरी बेटी अनुष्का की रचना

मेरी बेटी अनुष्का ने कंप्यूटर पर रची ये तस्वीर. एक घर , जो उसके सपने में है. तारे जो उसे प्यारे लगते हैं. कहीं किसी कोने में रात का भी डर है. इसलिए घर की तलाश में भटकता बच्चा भी बगल में खड़ा मिल जाएगा.

Friday, March 22, 2013

संजय दत्त... नायक, खलनायक, नायक और फिर खलनायक.



मुझे याद है अपना बचपन. घर में साप्ताहिक हिन्दुस्तान पत्रिका आती थी. उन दिनों सुनील दत्त शायद पंजाब की पदयात्रा कर रहे थे. उनके साथ प्रिया दत्त भी थीं. तभी लोगों ने प्रिया दत्त को भविष्य का एक लीडर बताया था. प्रिया दत्त लीडर भी बनीं. मगर संजय दत्त... नायक, खलनायक, नायक और फिर खलनायक. उस दूसरे जहां में सुनील दत्त और नरगिस संजय दत्त को इस हाल में देखकर तड़प रहे होंगे. उनके फैंस और उनकी लगातार फिल्में देखनेवाले भी आहत हैं. टीवी पर चिरंजीवी भी संजू बाबा कहते हुए माफी की अपील करते हैं. काटजू साहब तो खैर. मैं तो फिलहाल इस काबिल नहीं हूं कि किसी जजमेंट पर अपना मत दूं. लेकिन मुझे अपने देश में संजय दत्त के बहाने दो तस्वीर दिख रही है, जो डराती और तड़पाती है. एक तस्वीर में उन लाखों ऐसे लोगों की छाया है, जो हालात के शिकार होकर न्यायिक व्यवस्था के मकड़जाल में ऐसे फंस गए हैं कि उन्हें बाहर निकलने का मौका नहीं मिल रहा है. दूसरी ओर संजय दत्त, सलमान खान या अन्य बड़े लोगों की तस्वीर है, जिन्हें इसी ज्यूडिशियल सिस्टम में कभी माफ कर देने या सजा कम कर देने की अपील होती रहती है. स्टारडम का नशा शायद कुछ अलग होता है. 20 साल के लंबे सालों में संजय दत्त भी काफी बदल गए हैं. शरीर से और परिवार से. उन्होंने अपनी अपील में भी खुद के परिवार वाला होने की बात कही है. ऐसे में उनकी अपील और अन्य लोगों की दलीलों से थोड़ी देर के लिए मन पसीज उठता है. बेचारे को इतनी सजा. लेकिन हमारा दिल उन हजारों लोगों के दर्द को टटोलने की कोशिश नहीं करता है, जो मुंबई में घटी घटना के बाद से अब तक तड़प रहे हैं. उनमें से एक पीढ़ी ऐसी होगी कि जिसने पैदा होने से लेकर अब तक संजय दत्त के किस्से सुने होंगे.निश्चित रूप से ये कोई शहीदी गाथा नहीं है. यहां एक ऐसी कहानी है, जो सिर्फ संजय दत्त को गुनहगार ही बताती है. रूपहले पर्दे पर संजय दत्त से रूबरू होते हुए हम शायद उन्हें अपना ज्यादा मानने लगे हैं. लेकिन ये अपनापन काटजू साहब से लेकर हम लोगों तक के जेहन में बस एक छलावा ही पैदा कर रहा है. कानून या व्यवस्था की मजबूती के लिए संजू बाबा को आदेश मानना ही चाहिए. ये हमारी न्यायिक प्रतिष्ठा का सवाल भी है. 20 सालों तक पूरा सिस्टम जिस एक प्रक्रिया पर काम करता रहा, उसके बारे में सोचना चाहिए. फैमिली, स्टारडम और रूतबा आने और जानेवाली चीजें हैं. लेकिन राष्ट्र, न्याय व्यवस्था का सम्मान और सिस्टम की इज्जत करने जैसी बातें हमेशा रहेंगी. इसी पर अपने देश की साख भी है. इसलिए मुझे प्रिया दत्ता का रोना थोड़ा अखरता जरूर है, लेकिन परेशान नहीं करता. क्योंकि मुझे उन बहनों की भी याद आती है, जिन्होंने मुंबई की घटना के वक्त अपना भाई खोया था. 20 साल गुजर गए. 20 साल. इन 20 सालों में संजय दत्त की टीवी के पर्दे पर आती हर सीन उन बहनों को अपने भाई की याद दिलाती होगी. वैसे भी संजू बाबा पूरी कहानी के एक प्यादा मात्र हैं. संजू बाबा टूट चुके हैं. लेकिन हम भी टूट चुके हैं, एक अच्छे माता-पिता के संतान के इस कदर बिगड़ जाने के लिए. सुनील दत्त जैसे पिता को शुरुआती दिनों में अपने बेटे के लिए खुशामद करते देखने के लिए. जिन्होंने सुनील दत्त के उन दिनों की तड़प टीवी पर न्यूज के दौरान देखी थी, वे आज भी उसे महसूस करते हैं. शायद इसीलिए संजू बाबा ने ‘खलनायक’ फिल्म में अपने इमेज को भुनाया था. फिल्म भी सुपर हिट हुई थी. जाहिर है संजू बाबा मार्केट के हिसाब से उस दौरान खूब कमाते भी रहे. ‘वास्तव’ में जिस किरदार को जिया, वह हिला देता है. वैसे इस फैसले के बाद अगर संजू बाबा आदेश को मानते हुए अपनी शेष सजा सहज खुशी से पूरी करते हैं, तो वे रियल हीरो साबित होंगे. वैसे जिंदगी इम्तिहान लेती है. इसमें पास या फेल उन्हीं को करना है. हम सब तो यूं ही शब्दों से खेलते रहेंगे.  

Wednesday, March 20, 2013

ओ री गोरैया आना पास

मेरा बरामदा, खुला हुआ.हर कोना कुछ-कुछ यादों का टच लिए हुए. दिमाग हर कोने से जुड़े किस्से को करता है याद. याद आई एक घटना. एक नन्हीं सी जान की. मिली थी सीढ़ियों पर तड़पते हुए. ऊपर बरामदे के पास लगे मीटर में बनाए गए घोंसले से गिर गई थी. नन्हीं गोरैया को देखकर उस दिन दिल पिघल उठा् था. हाथों से उठाया. चुपचाप एक किनारे रख दिया. सांस चल रही थी. पानी पिलाने की कोशिश की, लेकिन उसने नहीं पी. मैं भी कुछ नहीं कर पाने की स्थिति में चुपचाप एकटक देखता रह गया था. वक्त बीत चला है. आज २० सालों के बाद उसी जगह फिर नजरें जाती हैं. लेकिन कुछ नहीं दिखता, न गोरैया. न घोंसला, अपनी नन्ही गोरैया जा चुकी है. कहीं दूर. मेरे आशियाने की दीवारों और घर के झरोखों में अब उसका घर नहीं बनता. तिनका-तिनका जोड़कर घोंसला बनाने की उसकी कवायद अब नहीं दिखती. मेरी दोनों बेटियां उन पलों को नहीं देख पा रही हैं, जिन्हें देखकर हम बड़े हुए. खिड़की के पास बगल में आकर गोरैयों के झुंड अब डिस्टर्ब नहीं करते. पंखें की आवाज आती है, लेकिन चहचहाहट नहीं. याद आता है कि दिवाली के समय जब घर की सफाई होती थी, तो ऊंचे रैक के कोने में घोंसलों का ढेर पड़ा मिलता था. जिसमें चंद नन्हीं जानें जरूर पड़ी मिल जाती थी. हम उन्हें कहीं कोने में संभालकर रख देते थे. तब उनकी मां उन्हें खोजती हुईं आती और फिर वहीं रैन बसेरा बनाने का सिलसिला चल निकलता. आज गोरैया दिवस पर ये सब बातें कहते हुए थोड़ा सा मन बुझा-बुझा सा लग रहा है. मोबाइल वाले हो गए. लेकिन गोरैया दूर हो गई. गांव की गलियों में अब भी दिखती हैं. दूर-दूर तक फैले मैदानों के पास वाले घरों में आज भी फुदकती हैं. लेकिन शहर से ये दूर हो गई हैं. हम शहरी लोग ज्यादा काबिल जरूर हुए हैं, लेकिन हमने अपनी चहचहाट खो दी है. नन्हीं गोरैयों का फुदकना अब लग्जरी में शामिल हो गया है.

एक कविता....
ओ री गोरैया आना पास
मेरा दिल है थोड़ा उदास
वो तु्म्हारा फुदकना, चहचहाना
तुरंत उड़कर इधर-उधर जाना
सबकुछ भूल गया मैं

दिखती हो तुम दूर मैदानों में

सन्नाटा पसरा है हमारे शहरी आशियानों में

कुछ तो कभी होगा खास

जब तुम आओगी हमारे पास
ओ री गोरैया आना पास
मेरा दिल है थोड़ा उदास

     

Saturday, March 9, 2013

शायद मैं सबसे खुशनसीब हूं...

अंकल कैसे हैं? अपने क्वार्टर से नीचे उतरते वक्त ऊपर के तल्ले पर रहनेवाले पड़ोसी से टकराते ही पहला सवाल. चिर-परिचित अंदाज में हंस कर ठीक है कहना और आगे बढ़ जाना. नहीं तो परिवार या मौसम के बारे में दो बातें, शब्दों के आदान-प्रदान के बाद अपनी-अपनी राह चल निकलना. ये मेरी जिंदगी का हर रोज का पार्ट है. सुबह दस बजे आफिस के लिए निकलने के दौरान अंकल मिल ही जाते हैं.

थोड़ा बैक ग्राउंड में ले चलता हूं. कुछ महीनों पहले घर में स्पेस की कमी की वजह से मां-बाप से दूर एक बड़े से फ्लैट में बतौर किराएदार खुद को शिफ्ट कर लिया था. जिसमें मैं अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ रहने लगा. बड़े-बड़े कमरे, बड़ा सा अपार्टमेंट. सुख-सुविधा सारा कुछ. लेकिन वहां दस बजे निकलने के दौरान बगल में रहनेवाले पड़ोसी मुस्कान से स्वागत करते नहीं मिले. वह मिलते, टकराते और फिर अपनी राह चल निकलते. दिन, हफ्ता और महीना गुजरता चला गया. स्थिति ऐसी हो गई कि बड़े से डैम के किनारे खड़े होने के बाद भी पानी के लिए तरस रहे हों. न कोई मुस्कुराहट और न ही गुस्सा. एकदम प्रोफेशनल लोगों से भेंट मुलाकात.

रांची से शहर में जहां लोग गर्मजोशी से मिलते हैं मुझे बदलते जमाने का अहसास हुआ. मन तड़पने लगा था. अंत में एक दोस्त से इस बारे में राय जाहिर की. उसने बताया कि अगर ऐसा है, तो लौट आओ अपने उसी पुराने आशियाने में यानी मां-बाप के पास. बस वहां एक ही चीज की कमी होगी कि तुम्हें वो रूम का बड़ा स्पेस नहीं मिलेगा, लेकिन दिल का बड़ा स्पेस मिलेगा. जहां बड़े दिलवाले पड़ोसी हैं और हाय-हेलो करनेवाले चंद परिचित. हम जैसे आम लोग, जो दौड़-भाग वाली नौकरी करते हैं, वह हो रहे इन सामाजिक बदलावों से परिचित नहीं हो पाते हैं. खास कर जब उन्हें अच्छे पड़ोसी मिले हों और मुस्कुराते रहनेवाले लोग. दर्द होने के बाद भी उस पर पेन रिमूवर क्रीम लगानेवाले चंद हाथ तुरंत मिल जाते हैं. ऐसे में जब रियल सिचुएशन से सामना होता है, तो स्थिति सांप-छुछंदरवाली हो जाती है.

सेल्फ सेंटर्ड होते जा रहे लोगों से टकराने पर अवसाद में पड़ने जैसी स्थिति होने लगती है. ऐेसे ही फेसबुक पर दो हजार से ज्यादा दोस्त हैं, लेकिन अगर उनमें से किसी को चैट रूम में तकलीफ दी, तो अजब-गजब रिएक्शन अधिकांश मामलों में मिल जाएंगे. कई भड़ासी भी ऐसे मिल जाएंगे, जो अपने कमेंट्स से आपको तिलमिलाने की कोशिश करें. वे यह नहीं सोचेंगे कि इस ओपेन वर्चुअल स्पेस पर हर कमेंट हजारों निगाहों से होकर गुजरती है और ये किसी की इज्जत को चिंदी-चिंदी कर सकती है. यूं कहें कि आप बेगानेपन की स्थिति से दूर होने की कोशिश करने के लिए अगर चंद दोस्तों या परिचितों का साथ चाहेंगे, तो उसके लिए आपको भाग्यशाली बनना होगा. क्योंकि ऐसे बिरले ही लोग होंगे, जिन्हें रोज मुस्कुरा कर हाय हेलो करनेवाले पड़ोसी मिल जाएं. सौभाग्य से मुझे मिले हैं, मैं खुश हूं और आज इसे आपसे शेयर कर रहा हूं.

अगर आप थोड़ा गंभीर होकर सोचें, तो पाएंगे कि प्रोफेशनल होना जितना आसान होता है, उतना ही मुश्किल होता है किसी को स्नेह से बांधना. शायद इसी प्रोफेशनल होते माइंडसेट ने कोर्ट में तलाक के केसेज बढ़ा दिए हैं. दूसरों के लिए खुद को समर्पित करनेवाले लोग नहीं मिलते. आज कल मेरे हिसाब से पहले जैसी समर्पित मां, पिता, भाई, बहन या पत्नी कम ही मिलती हैं. ये वे लोग हैं, जो तमाम तकलीफों को सहते हुए भी आपके लिए अपनी सुविधाएं छोड़ने के लिए तैयार रहते हैं.आपकी खुशी अपनी खुशी लगती है. टूटते घर और लगातार बनती बड़ी बिल्डिगों के बीच आपके जेहन में भी ये सब बातें आती ही होगी. मुझे लगता है कि अच्छे पड़ोसी, अच्छी बेटियां, अच्छे माता-पिता और अच्छी पत्नी को पाकर मैं शायद इस दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान हूं, तो ये गलत नहीं होगा. ईश्वर से कोई शिकायत नहीं. अब शिकायत सिर्फ उन लोगों से है, जिन्होंने प्रोफेशनल होने का ढोंग कर अपने जैसों की संख्या ज्यादा कर ली है और इसे बदलते जमाने का नाम दे दिया है.   

Friday, March 1, 2013

याद आती हैं वो पुरानी शामें और फायरिंग रेंज की सड़क

मैं जिस कॉलोनी में रहता हूं, वहां से कुछ दूरी पर एक फायरिंग रेंज है. आज से 20 साल पहले तक वहां का दृश्य कुछ और हुआ करता था. पहाड़ी, दो किमी लंबी सड़क और वहां शाम के समय टहलती मिश्रित आबादी. जो पूरे जेहन में एक बेहतरीन टूरिस्ट स्पॉट का नजारा पेश करती थी. शाम होते ही हमारे कदम दो-तीन दोस्तों के संग वहां पहुंच जाते थे. बुजुर्ग अपने ग्रुप में. बच्चे अपनी मम्मी और भाई-बहन के साथ. कुछ मजदूर और सैनिक, जो वहां पहरे के लिए तैनात रहते, दिन भर की थकान मिटाते नजर आते. पूरी दुनिया एक जगह नजर आती.

 बुजुर्गों की जुबान पर लेटेस्ट पॉलिटिकल डेवलपमेंट हुआ करता था. आगे-पीछे चलते हम लोग उनकी एनालिसिस चुपचाप सुनते रहते. कभी उनके प्वाइंट आफ व्यू सुनकर हम भी आपस में दोस्तों के साथ बहस करते थे. उसी लंबी सड़क पर चंद जवान अपनी मोटरसाइकिल से रफ्तार का जोश दिखाते नजर आते. यूं कहें एक अलग ही दुनिया थी. वहां से रांची के एक किनारे पर मौजूद टैगोर हिल साफ दिखता था. क्योंकि उस समय तक न तो वहां उतने मकान थे और न ही उतनी गगनचुंबी इमारतें. खेत ही खेत नजर आते थे. हमने नौकरी पकड़ ली. साप्ताहिक छुट्टी के दिन वहां जरूर चले जाते थे. उस समय के बाद के सालों में फायरिंग रेंज के अगल-बगल इक्के-दुकान मकान बनते देखकर मन विचलित हो उठता था.

मकानों के बनने की रफ्तार बढ़ने लगी. फायरिंग रेंज को अंततः आम अवाम से दूर करते हुए बंद कर दिया गया. वहां पर कंटीले तार लगाकर लोहे के गेट लगा दिए गए. वहां अब कोई आम आदमी घूमने नहीं जा सकता था. पहले की स्चच्छंदता जाती रही. शाम के समय घूमने के शौकीन अब कॉलोनी की सड़क पर ही चहलकदमी करते नजर आने लगे. हमारा भी साथ छूट गया. जो लोग पहले फायरिंग रेंज के पास पहाड़ी की ओर जाती सड़क पर मिलते थे, उनसे काफी दिनों के बाद ही मुलाकात हो पाती. कॉलोनी की सड़कों पर घूमते हुए आप उन्मुक्त आकाश और सुकून देनेवाली हरियाली  को नहीं पा सकते. आज भी उस ओर से जाना होता है. वहां पर जब भी फायरिंग रेंज के लोहे के एंट्रेंस गेट को देखता हूं, तो एक टीस सी उठती है. डर लगता है. रोज शाम को गुजारी गई उस खुली जिंदगी की याद आती है, जो अब कभी नहीं आएगी.

पहाड़ी पर से पूरी रांची को देखने की अपनी ललक की याद आती है. तब हम दोस्त शाम के समय आपसी प्रतियोगिता करते हुए पहाड़ की चोटियों पर चढ़ जाते. वहां से मीलों दूर तक फैली रांची को निहारते. ऊपर पहाड़ी पर गुफाओं में चमगादड़ भी लटके मिलते और मधुमक्खियों के छत्ते भी. तब डर नहीं लगा कभी भी. मेरी कॉलोनी का कोई बंदा अब पहाड़ी पर नहीं जाता. क्योंकि लोगों ने पहाड़ी पर ही घर बना लिया है. सुनते हैं कि रांची में जमीन कम पड़ गई है. सब लोग इस उगते शहर की ओर ही आ रहे हैं. लेकिन किस जिंदगी की तलाश मे. वो जिंदगी जो अब नहीं रही. उन्हें न तो वह पुरानी हरियाली मिलेगी और न सुकून. मोरहाबादी भी अब वैसा नहीं रहा.हरे पेड़ों को बेदर्दी से काट डाला गया है. मन जार-जार रोता है. सुकून की तलाश करता है. अपने से छोटों के लिए कैसी जिंदगी हम सबने तैयार कर ली है. वैसे भी सब कुछ अपने कंट्रोल में नहीं है. जैसे कि आप कैसा कमेंट देंगे, ये मैं नहीं जानता. लेकिन उन पुरानी शामों के बारे में लिखकर मैंने कुछ सुकून के पल जरूर चुरा लिए हैं.

Saturday, January 19, 2013

वेलकम यू इन न्यू रांची.

इंग्लैंड पर जीत के बाद मेन रोड में सेलिब्रेशन

मेरा शहर 20 साल पहले यानी 1990-92 में हरियाली के लिए जाना जाता था. गोस्सनर कॉलेज में मैं पढ़ता था. याद आता है कि गोस्सनर कॉलेज से रांची कॉलेज और वहां से घूमते-घामते मोरहाबादी होते हुए घर तक साइकिल यात्रा करना. सुखद, यादगार और मन को छू लेनेवाले छायादार पेड़ों के साथ अपनी दोस्ती. उस समय न तो आज की तरह करियर बनाने की फिक्र रही और न ही कुछ कर दिखाने का जुनून था.

२०१३ की जनवरी में आज भी उन्हीं रास्तों से होकर गुजरना होता है, लेकिन अब वह बात नहीं. बात अगर कल की ही करें, तो शहर में घूमने का एक बहाना मिल गया और मौका था वन डे इंटरनेशनल मैच का. मैंने भी अपने साथी के साथ इंटरनेशनल स्टेडियम का एक चक्कर जाकर लगाया. शहर के बदलते मिजाज को भांपा. रास्ते में मोटरसाइकिल पर सड़कों की लंबाई मापने के वक्त जेहन में वही पिछली यादें चक्करघिन्नी की तरह आ और जा रही थी. शहर बदल गया, लोग बदल गए और अब इसका मिजाज भी इंटरनेशनल हो चला. बड़े-बड़े होटल, इंटरनेशनल एयरपोर्ट और इंटरनेशनल स्टेडियम अब शहर के मिजाज को काफी हद तक बदल चुके हैं.

इंटरनेशनल स्टेडिटम के बाहर पेड़ पर से मैच का नजारा लेते लोग
सिटी के इंटरनेशनल स्टेडियम में जुटी भीड़
सिटी के एचईसी में शायद इससे पहले इतनी ज्यादा ट्रैफिक नहीं रही होगी. एचईसी ने कम से कम शहर को पसरने का मौका दिया है. चौड़ी सड़कें और खुली हवा जमकर सांस लेने को पुकारती रहती है. आप खुश होना चाहते हैं, खुद से दूर होकर लंबी सैर करना चाहते हैं, तो यहां की सड़कें आपको ये मौका देती हैं. मुझे शहर के बदलते मिजाज से ये खुशी है कि हम बदलती दुनिया से तेजी से कदमताल करते हुए चल रहे हैं. खास कर स्पोर्ट्स में. एचआईएल के आयोजन ने भी अपने शहर को खास बना दिया है. कैप्टन धौनी ने भी माना कि अब रांची कहां है, ये बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी. यहां अब सबकुछ इंटरनेशनल हो रहा है.

वैसे इंटरनेशनल होता शहर बाकी चीजों में लोकल होकर न रह जाए, ये ख्याल रखना होगा. छोटे शहर बड़े बनते जरूर हैं, लेकिन उसमें अमीर-गरीब का फासला भी बढ़ता है. शायद रांची जैसे पहले के छोटे शहर इस मामले में गलती कर रहे हैं. कहीं-कहीं शायद चूक हो जा रही है. वैसे रांची के जनता शानदार मेहमाननवाजी के लिए भी शुक्रगुजार है. तीन दिनों तक मस्ती, जुनून का ऐसा आलम छाया रहा कि अखबारों के पन्नों में दूसरी खबरों के लिए जगह कम ही बची. ऐसा स्वागत हुआ कि अंग्रेज क्रिकेटर्स भी इस पूरे जुनून को कैमरे में उतारते रहे. मेजबान रांची सबके दिलों को खुश कर गई. रांची राइनो का राइनो स्टाइल भी पॉपुलर हो रहा है. नए साल के पहले महीने में बदलाव का ये पैगाम पूरे साल के लिए जोश दे गया. हम तो बस एक शब्द में कहेंगे-वेलकम यू इन न्यू रांची.

Tuesday, September 4, 2012

आम आदमी, बंद और राजनीतिक तमाशा

हमारे देश में जिस आम आदमी के लिए हमारे राजनीतिक दल संघर्ष का ऐलान करते हैं या आंदोलन करते हैं, वो आम आदमी आज कहां है, किस हालत में है, ये सोचने की फिक्र किसी को नहीं है. कल रांची में झाविमो का सचिवालय घेराव आंदोलन था. पुलिस ने भी आंदोलन को कूचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी और आंदोलनकारियों ने भी जमकर बवाल किया. जानकारी के लिए अखबार में छपी तस्वीरों को आप देख सकते हैं. इस पूरे प्रदर्शन में एक आम आदमी यूं ही मारा गया. हो सकता है कि वह एक कार्यकर्ता भी रहा हो. लेकिन आंदोलन के इस तेवर को अपनाने से पहले हमारे लीडर आम आदमी के बारे में कुछ नहीं सोचते. ये जो आम आदमी है, वह भी तनाव में जाने-अनजाने एक भीड़ का हिस्सा बन जाता है. फिर हालात बिगड़ने पर खुद शिकार भी. इधर रांची में ही कुछ न कुछ सवालों को लेकर आए दिन बंद का आह्वान हो रहा है. सुरक्षा, नगड़ी से लेकर महंगाई तक का मुद्दा हो, दल या ग्रुप तत्काल बंद का आह्वान कर रहे हैं. बीच में रुक गया सिलसिला फिर से चल पड़ा है. बंद के दिन स्कूल, कॉलेज तो पहले से ही अब अपने गेट पर ताला लगाकर बैठ जाते हैं और पब्लिक छुट्टी मूड में आ जाती है. लेकिन इससे  कितना नुकसान पहुंच रहा है, ये किसी को समझ में नहीं आ रहा. शुरू में जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन के जरिए सामूहिक संघर्ष की जो ताकत दिखाई, वह बंद के रूप में आज एक परंपरा या कहें नासूर बन चुका है. इस बंद वाले दिन मरीज को गाड़ी नहीं मिलती और एग्जामिनी को सेंटर पर जाने के लिए सवारी. शायद लोग भी अभ्यस्त हो गए हैं. हमारी मीडिया भी इन सब सवालों से अलग रहती है. उसे राज ठाकरे की बयानबाजी नजर आती है, लेकिन इस गंभीर मसले का जिक्र करना उचित नहीं लगता. सवाल यही है कि ये आम आदमी जाए, तो जाए कहां. न तो उन्हें स्टेट के सीएम राहत देने की बात करते हैं और न कंट्री के पीएम. रांची जैसे छोटे शहर में भी हालत ये है कि एक सप्ताह में अगर आपने सातों दिन कोई न कोई काम तय किया है, तो समझ लें कि चार दिन आपका काम नहीं होगा. क्योंकि किसी न किसी कारणवश शहर में ऐसा कुछ जरूर हो जाता है कि पब्लिक को घर में रहना ही ज्यादा बेहतर नजर आता है. इस छोटी सी राजधानी का जब ये हाल है, तो बड़े शहरों के आम आदमी की बात ही कुछ और होगी. वैसे एक आम आदमी किसी आंदोलन में बिना कसूर के बेमौत मरे, इससे शर्मनाक बात शायद ही कुछ और हो.

Tuesday, August 28, 2012

क्या आपको ये 'दुनिया' बेचैन नहीं करती


आज हर कोई एक बेहतर करियर चाहता है. बच्चे के जन्म से लेकर उसके ग्रेजुएट होने तक मां-बाप रात दिन लगे रहते हैं. मैं भी ऐसे कई माता-पिता को जानता हूं. जिन्होंने ९० के दशक में अपने सारे सामाजिक काम सिर्फ बच्चों की खुशियों के कुर्बान कर दिया. उन्होंने एक पाठ सिखाया-बेटा सिर्फ पढ़. अगल-बगल मत देख, नहीं तो बिगड़ जाओगे. उनमें से कई बच्चे आज कामयाब हैं, लेकिन उनकी कामयाबी उनके मां-बाप के हिस्से से दूर है. मां-बाप को हर रोज आठ बजे सिर्फ एक फोन का इंतजार रहता है, बेटा आफिस जाने से पहले बस एक घंटी बजाकर बोलता है-मां-पपा ठीक हूं. आप ठीक हैं ना. मां-बाप दिल में सिर्फ ये संतोष रखकर जी लेते हैं कि बेटा हर दिन कामयाबी की सीढ़ी चढ़ रहा है. लेकिन उसे बेटे या बेटी के पास अपने माता-पिता के दर्द के लिए समय है ही नहीं.

रिश्तों का दरकता संसार अंदर से तोड़ रहा है.  आप कभी गांव गए हैं क्या? खासकर बिहार के गांव. जहां आपको बूढ़े मां-बाप किसी पेड़ के नीचे अपने बच्चे से फोन पर बतियाते मिल जाएंगे. घर के घर खाली हैं. वहां रहनेवाले बाहर मोटी कमाई कर रहे हैं. पता चला है कि उनके एकमात्र चिराग ने अपनी धर्मपत्नी ढूंढ़ ली है और अब उसी दिल्ली या मुंबई में एक घर भी खरीदनेवाला है. यानी गांव का घर, गांव की जमीन भगवान भरोसे हो चली. आप सोच रहे होंगे कि ये बंदा क्या बके जा रहा है. ये तो दुनियादारी में चलता है. लेकिन यार ये कैसी दुनियादारी, कैसी यारी. अपने बच्चे, अपने ही मां-बाप से दूर रहकर सपनों की नई दुनिया रच रहे हैं. एक खुदगर्ज दुनिया. जहां दीवारों पर नई पेंटिंग और नई एलइडी टीवी तो है, लेकिन अपनापन नहीं. सिटी के ओल्ड एज होम में चले जाइए. कई बुजुर्ग गर्व से पांच-पांच संतानों के होने का दावा करेंगे, लेकिन अगले ही पल उनकी आंखें शून्य में कुछ टटोलती नजर आएंगी.

हमारे शहर और हमारे गांव में एक जो अनजानी दुनिया खुद ब खुद हम लोगों के तिरस्कार के कारण बनती जा रही है, उसे जानने या समझने की चेष्टा किसी को नहीं है. जीवन के संघर्ष को समझना मुश्किल है. लेकिन रिटायर्ड हर्ट हुए क्रिकेटर लक्षमण के शब्दों को समझिए, जो उन्होंने अपने पिता से सीखा और समझा. उनके पिता ने कहा कि मानव जीवन में कहीं न कहीं संतोष होना चाहिए. एक ऐसा संतोष, जो आपको और आपके अपनों को एक स्थायी दुनिया दे. जहां न तो दूरी की बेचैनी हो और न कोई बेगानापन. शहर तो बनते और बिगड़ते रहते हैं. लेकिन दिलो की दूरियां एक बार बढ़ जाएं, तो उसे पाटना मुश्किल है. हम जानते हैं कि हम सबके भीतर कहीं न कहीं आग जल रही है, लेकिन उस आग को हवा देने की कोशिश नहीं होती. थोड़ी सी कोशिश हो, तो ये जो ओल्ड एज प्रॉब्लम है, जिसे शायद आमिर का सत्यमेव जयते भी सुधार न पाए, कुछ हद तक ठीक हो सकती है.

सबसे खतरनाक है मुर्दा शांति से भर जाना, न होना तड़प का, सब सहन कर जाना घर से निकलना काम पर और काम से लौटकर घर आना, सबसे खतरनाक है हमारे सपनों का मर जाना!
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